Thursday, July 19, 2012

ताजमहल एक तेजोमहालय मंदिर है - स्व: श्री पी० एन० ओक (१२१ आकाट्य प्रमाण) भाग - 3

  1. गुंबद का हिन्दू वैशिष्ट्य - ताजमहल के गुंबद मे आवाज प्रतिध्वनित करने का गुण है । कब्र मे शांति और मौनता के स्थान पर इस प्रकार के गुंबद का होना वेतुकापन है । इसके विपरीत हिन्दू मंदिरो के गुंबदों मे प्रतिध्वनित करने का गुण होना आवश्यक है क्योंकि हिन्दू-देवताओं की पुजा या आरती करते समय शंखो, घंटाओ एवं मृदंगो की प्रतिध्वनित एवं वंधित ध्वनि से तांडव के अनुकूल नादब्रह्म निर्माण होता हैं  
  2. ताजमहल के गुंबद के शिखर पर  कमलचिन्ह बना हुआ है जो हिन्दू लक्षण है । इस्लामी गुम्बद गजा होता हैं । जैसे दिल्ली के चाणक्यपुरी मे बने इस्लामी दूतावास के गुंबद । उस गुंबद के कटिभाग मे जो मेखला बनाई गई है वह भी कमलपटलों की हैं । इस प्रकार गुंबद का पद् मासन भी हिन्दू लक्षण है, क्योंकि हस्तकमल, चरणकमल, नेत्रकमल आदि वैदिक परिभाषा ही हैं ।  
  3.  ताजमहल का प्रवेश द्वार दक्षिणाभिमुख है जब कि यदि वह मूलत: कब्र होती तो उसका द्वार पश्चिम की ओर होना चाहिए था । मुमताज यदि सचमुच ताजमहल मे दफनाई गई होती तो उसकी आत्मा वहाँ पश्चिम द्वार न होने से वही तड़पती होती ।  
  4. मुर्दे का टीला कब्र कहलाती है न कि भवन -
  5. मुर्दे के दफन स्थान पर जो पत्थर या ईटों का छोटा टीला बना होता है उसे कब्र कहा जाता हैं न की  भवन । यह तत्व पाठक अवश्य ध्यान मे रखे । विश्व भर मे यह तथ्य लागू हैं । जैसे कि मिस्र देश के एक पिरामिड मे सम्राट ट्यूटेन खॅमेन् के दफन स्थान पर कब्र के रूप मे शव पाया गया । अत: आज तक के पाश्चिमात्य विद्धासमझते रहे कि ट्यूटेन खॅमेन् के दफनस्थल पर कब्र के रूप मे वह विशाल पिरामिड बनाया गया । वह बड़ी भारी भूल है । जब ट्यूटेन खॅमेन् का कोई महल नही है और मृत ट्यूटेन खॅमेन् के लिए कब्र के रूप मे जिसने वह विशाल पिरामिड बनवाया ऐसा समझा जाता है उसका अपना जब कोई महल नही है तो मृत ट्यूटेन खॅमेन् के लिए कौन पिरामिड जैसी विशाल कब्र बनाएगा ? विविध पिरामिड तो मुरुस्थल के विशाल किले हैं । मुरुस्थल के तूफान मे रेत के ढेरो से छत ढक जाती हैं । अत: पिरामिड की दीवारे ढलान वाली बनाई गयी हैं । उल्टे धरे हुए यज्ञपात्र जैसा उनका आकार है । उसका मूल वैदिक है ।  
  6. इस्लामी प्रथा के अनुसार मुसलमान राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन यदि दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय कक्ष मे दफनाए जाते तो उनकी पुण्यतिथि पर पटना, अलीगढ़, वाराणसी आदि स्थानो से उनके सगे-संबंधी दिल्ली मे आकार निजी रिश्तेदारों के यहाँ ठहरते । दूसरे दिन वे कब्र पर जाने के लिए निकलकर लोगो से रास्ता पूंछते । रास्ता पूंछते समय उनकी भावना होती है कि किसी मैदान मे जाकिर हुसैन को दफनाकर उस स्थान पर एक छोटा टीला बना दिया होगा । रास्ता पूंछते- पूंछते दाएँ-बाएँ मुड़ते हुए वे किसी प्रकार राष्ट्रपति भवन के सपास पहुँच जाते हैं जब वे अंतिम व्यक्ति से पूंछते हैं कि जाकिर हुसैन जी की कब्र कहाँ हैंतो उन्हे अंगुली-निर्देश से ऊँचे गुंबद की दिशा मे इशारा करके कहा जाता है कि वह देखो वह जो ऊंचा गुंबद दिख रहा हैं वही कब्र हैंउस उद्गार से प्रेक्षकों का मतिभ्रम होता हैं । निकलते समय उनकी कल्पना थी कि किसी मैदान मे मृतक के दफनस्थल के ऊपर एक छोटा टीला होगा । किन्तु प्रत्यक्ष मे उन्हे गुंबद वाला विशाल विस्तृत भवन ही कब्र बताया जाता है । अत: पाठक इस बात का ध्यान रखे कि विश्व मे वड़े ब्यक्तियों को बड़े भवनो मे दफनाया गया हैं । तथापि वे भवन कब्र नही है । उसके अंदर का टीला कब्र होता है । इस द्रष्टि से ताजमहल के अंदर मुमताज का टीला भले ही कब्र हो किन्तु उसके ऊपर वाला विशाल भवन तेजोमहालय नाम का प्राचीन मंदिर है । इमारत कभी कब्र नही होती । 
  7. संगमरमरी ताजमहल की चार मंजिले हैं । उसके तले नदीस्तर के नीचे का तहखाना मिलाकर तीन मंजिले लाल पत्थर की बनी हैं । इस प्रकार वह सात मंजिला भवन है, रामायण काल से राजा-रईसो के भवन सात मंजिले बनाने की प्रथा है । पुणे मे पेशवाओ का शनिवार वाड़ा सात मंज़िला था । अंग्रेजों ने उसे खाक कर डाला । इंदौर मे होलकरो का जुना राजवाड़ा सात मंजिला है । ताजमहल परिसर मे तो और भी इमारतें सात मंजिली हैं । संगमरमरी ताजमहल के प्रति मुंह किये दाएँ-बाएँ जो दो जोड़ी के भवन हैं उनकी भी सात मंजिल हैं । जिस लाल पत्थर के भव्य प्रवेश द्वार पर टिकट प्राप्त होते हैं वह भी सात मंजिला है । यह प्रथा सर्वथा हिन्दू हैं । 
  8. संगमरमरी चबूतरे के नीचे जो लाल पत्थर की मंजिल है उसमे यमुना प्रवाह की सीध मे २२ कक्षो की कतार हैं । उनकी खिड़कियाँ, झरोखे आदि शाहजहाँ ने ईटों से तथा चुने से ऊबड़-खाबड़ बंद करा दिए हैं । अत: अंदर घना अंधेरा हैं । उनमे उतरने के दो जीने है । संगमरमरी चबूतरे के पीछे दाएँ-बाएँ कोनो मे वे जीने देखे जा सकते हैं । प्रेक्षक उनकी १७ पौड़ी उतर भी सकते हैं । किन्तु कक्षों में प्रवेश करने के द्वारो का पुरातत्व खाते के ताले लगे होते हैं । वह खुलबाने पर प्रेक्षक अंदर दाखिल हो सकते है । उन कक्षो की दीवारों तथा छतों पर अभी कही-कही हिन्दू रंग लगा हुआ हैं । उन २२ कक्षों के पश्चात अंदर की तरफ लगभग ३२५ फीट लंबा और ८ फीट चौड़ा एक आला या बरामदा-सा बना हुआ है । वहाँ भी घना अंधेरा हैं ।  
  9. मूर्तियो वाला कक्ष - इस आले से और अंदर जाने के लिए दाएँ-बाएँ कोनो के पास दो द्वार बने हैं किन्तु वे ईटों से आबड़-खाबड़ चुनवा दिए गये हैं । सन् १९३२-३४ मे कई व्यक्तिओ ने उसमे पड़े सुराखो से अंदर झाका तो अनेक स्तंभो वाला एक विशाल कक्ष दिखा । उन स्तंभो पर मूर्तियां खुदी हैं । उस समय वह देखकर उन्हे बड़ी उलझन-सी हुई कि शाहजहाँ ने यदि ताजमहल बनाया तो नीचे मूर्तियां क्यों हैं ? उस उलझन का उत्तर अब उन्हे मिला कि तेजोमहालय मूलत: मंदिर ही होने से उसमे अनेकानेक मूर्तियाँ थी । शाहजहाँ ने उस पर कब्जा कर उसमे कब्रे ठूँस दी और द्वार के कमानो पर कुरान की आयते जड़ दी ।
  10.  ताजमहल के सातों मंजिलों के सैकड़ो कक्ष यदि खुलवा दिए गये तो हो सकता हैं उनमे से कई देवमूर्तियाँ तथा संस्कृत शिलालेख प्राप्त हो । सात मंजिले कुएं से खारा जल निकालकर देखना आवश्यक हैं क्योकि उसके तल मे भी ऐसे कुछ प्रमाण छुपे पड़े हो सकते हैं । 
  11. ताजमहल में देवमूर्तियाँ पाई गई हैं - सन् १९५२ के आसपास जब एस० आर० राव ताजमहल पर पुरातत्व अधिकारी नियुक्त थे, ताजमहल की एक दीवार मे एक लम्बी-चौड़ी दरार दिखाई दी । कारीगर को बुलाकर मरम्मत आरंभ हुई । आसपास की और ईटें निकालने की आवश्यकता पड़ी । वे ईटें निकलते ही अष्टवसु की मूर्तियां बाहर दिखाई पड़ने लगी । परंतु मरम्मत रुकवाकर दिल्ली के पुरातत्व प्रमुख से मार्गदर्शन मांगा गया । उस अधिकारी ने शिक्षामंत्री अबुल कलाम आजाद से पूंछा । उन्होने प्रधानमंत्री नेहरू से पूछा । तब निर्णय यह हुआ कि मूर्तियाँ जहां से निकली हैं, वही बंद करवा दी जाएँ । दीवार में दरार पड़ने का कारण भी यही था कि शाहजहाँ के समय में उस दीवार की ईटें निकालकर उसमे मूर्तियाँ ठूंस दी गई थी । उस घटना के कुछ वर्ष पश्चात टी० एन० पद्मनाभन जब ताजमहल पर पुरातत्व अधिकारी थे तो उन्हे ताजमहल मे विष्णु की मूर्ति प्राप्त हुई थी । किन्तु कनिंयहम के समय से पुरातत्व खाता समय-समय पर प्राप्त होने वाले ऐसे प्रमाणो को प्राप्ति स्थानो से दूर कहीं ले जाकर छुपता रहा हैं । शाहजहाँ ने जब तेजोमहालय मंदिर हथिया लिया तब उसने सारी मूर्तियाँ निकलवाकर दीवारों मे या भूमि मे दबवा दी ।
  12. शाहजहाँ से पूर्व ताजमहल के उल्लेख - ताजमहल के मूल निर्माण के सम्बंध मे प्रकट सार्वजनिक रुप से पूरी प्रकट जांच होना आवश्यक हैं । तथापि अब तक जो प्रमाण प्राप्त हैं उनसे ऐसा लगता है कि सन् ११५५ ईसवी के आश्विन शुक्ल पंचमी रविवार के दिन यह तेजोमहालय शिवमंदिर राजा परमर्दिदेव के शासन कल मे बनकर तैयार हुआ । अत: मुहम्मद  गोरी से कई मुसलमान आक्रमको ने ताजमहल के द्वार आदि तोड़कर उसे लूटा । तथापि प्रत्येक हमले के पश्चात सोमनाथ की तरह हिन्दू लोग नये द्वार आदि लगवाकर तथा मूर्तियो की पुनर्स्थापना कर तेजोमहालय को ठीक-ठाक करते रहे । उस कड़ी मे शाहजहाँ अंतिम इस्लामी आक्रामक था जिसने तेजोमहालय शिवमंदिर को कायम इस्लामी कब्रस्थान ही बना छोड़ा । 
  13. Aakbar the Great Moghul नाम के ग्रंथ मे लेखक Vincent  Smith ने उल्लेख किया हैं कि बाबर का साहसी जीवन सन् १५३० मे आगरा नगर स्थित उसके उद्धान महल में समाप्त हुआ । वह उद्धानमहल ताजमहल ही है ।  
  14. बाबर के कन्या गुलबदन बेगम ने नुमायूननामा शीर्षक का इतिहास लिखा है । उसमे ताजमहल का उल्लेख गूढ़ रहस्यपूर्ण महल के नाम से किया है, क्योकि ताजमहल में ॐ, शंख, नाग, त्रिशूल, देवमूर्तियां आदि आध्यात्मिक चिन्हो की भरमार थी । 
  15. स्वयं बाबर के लिखे बाबरनामे मे लिखा है कि इब्राहीम लोदी से जीते हुए आगरा स्थित महल मे बाबर ने ईद मनाई । उस महल का एक केन्द्रीय अष्टकोना कक्ष है और चारो कोनो पर मीनारे है । वह सारे ऐतिहासिक इस्लामी उल्लेख शाहजहाँ से १०० वर्ष पूर्व के हैं । किसी भी तत्कालीन इस्लामी तवारीख मे उस इमारत को तेजोमहालय उर्फ ताजमहल इसलिए नही कहा है कि इस्लामी आक्रामक हिन्दू नामो का तीव्र तिरस्कार करते थे ।  
  16.  ताजमहल परिसर ३८-४० एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । उसकी दिवारे उत्तर मे नदी के पार और पश्चिम मे विक्टोरिया वाग मे भी बनी हुई देखी जा सकती हैं । उन दीवारों के अंत मे अष्टकोने छ्त्र बने हुए है । मृतक की कब्र के लिए सैकड़ो कक्षो वाला इतना विशाल परिसर वनाना हास्यास्पद हैं। 
  17. ताजमहल मुमताज की कब्र के लिए बनाया जाता तो उस परिसर मे सरहंदी बेगम, फतेपुरी बेगम, सातुन्निसा खानम और एक फकीर आदि की कब्रे नही होती और न ही होनी चाहिए थी । सरहंदी बेगम तथा फतेपुरी बेगम दोनों मुमताज के समान रानियाँ होते हुए भी दरबानो की तरह वे बाहर हाथी चौक मे दफनाई गई हैं जबकि मुमताज बड़ी शान से केन्द्रीय गुंबद के नीचे दफनाई हुई हैं । यह इस कारण हुआ कि एक हिन्दू  मंदिर को किसी प्रकार लूटकर नाकाम कर उसे इस्लामी कब्रस्थान बनाना मूल उद्देश्य था । अत: जिस समय जो शाही महिला मरी उसे ताजमहल परिसर मे जो भी रिक्त कोना दिखा उसमे दफना दिया गया ।   
  18.  मुमताज से विवाह होने से पूर्व शाहजहाँ के कई अन्य विवाह हुए थे । उसी प्रकार मुमताज से विवाहबद्ध होने के पश्चात भी शाहजहाँ के और कई विवाह हुए थे । अत: मुमताज की मृत्यु पर उसकी कब्र के रूप मे एक अनोखा खर्चीला ताजमहल वनवाए जाने का कोई कारण ही नही था । 
  19. मुमताज किसी सुल्तान या बादशाह की कन्या न होने के कारण उसे किसी विशेष प्रकार के भव्य महल मे दफनाने का कोई प्रश्न ही नही था ।  
  20.  आगरे से ६०० मील दूर बुरहानपुर मे मुमताज की मृत्यु हुई थी । वहाँ उसे दफनाया भी गया । पुरातत्व विभाग के अनुसार बुरहानपुरवा मे मुमताज की कब्र ज्यों-की-त्यों बनी हुई हैं अत: उसके नाम से आगरे मे जो दो कब्रे बनी है वे दोनों नकली होनी चाहिए और उनके अंदर शिवलिंग ही दफनाए गये होंगे ।    
  21. बुरहानपुर से मुमताज का शव आगरा लाने का ढोंग इस कारण किया गया था कि मुमताज को दफनाने के वहाने राजा जयसिंह पर दबाव डालकर तेजोमहालय पर कब्जा करना और उसमे धरी हुई सारी संपत्ति लूट लेना ।  
  22. जि शाहजहाँ ने जीवित मुमताज के निवास या विहार (घूमने) के लिए एक भी महल नही बनवाया वह मृत मुमताज के शव के लिए महल क्यों वाएगा ? यह भी एक सोचने की बात है ।  
  23. शाहजहाँ के बादशाह बनने के पश्चात ढाई-तीन वर्षो में ही मुमताज की मृत्यु हुई । इतनी कम अवधि में मुमताज की कब्र पर अनाप-शनाप खर्चा करने के लिए खजाने मे धन था ही कहाँ ? 
  24. मुमताज के शव पर अप्रतिम महल वनवाने योग्य शाहजहाँ-मुमताज के असीम प्रेम का उल्लेख इतिहास मे जरा भी नहीं हैं । उल्टा शाहजहाँ के व्यभिचार तथा अनैतिक संबंधो की घटनाएँ कई हैं । निजी कन्या जहाँनारा, तथा जनानखाने मे तैनात दासियाँ और शाइस्ताखान की एक बेगम आदि से शाहजहाँ के अवैध संबंद होते थे । ऐसा स्त्रीलंपट तथा अनाचारी व्यक्ति मुमताज की मृत्यु पर उसकी कब्र के लिए अपार धन खर्च कर ही नहीं सकता । 
  25. शाहजहाँ बड़ा कंजूस तथा लोभी व्यक्ति था । अपने सारे विरोधियो का वध करके गद्दीनसीन होने वाला वह पहला मुगल बादशाह था । अत: किसी के दफन के लिए अपार धन बहाने वाली उदारता शाहजहाँ मे नहीं थी ।  
  26.  मुमताज पर असीम प्रेम होने के कारण ताजमहल जैसी सुंदर कब्र का निर्माण हुआ यह निष्कर्ष मानवशास्त्र की दृष्टि से निराधार है । किसी स्त्री के लिए लैगिक, कामुक या वैषयिक प्रेम किसी पुरुष मे कर्तत्व नहीं जगाता । वैषयिक प्रेम से तो पुरुष निर्बल, इतबल, उदास तथा कृति शून्य बनाता है । यदि कोई युवक स्त्रियों के प्रेम मे फंस जाए तो उसके माता-पिता को चिंता होने लगती है । वे सोचते है कि हमारा पुत्र तो काम से गया । इससे किसी प्रकार की आशा रखना व्यर्थ है । उसका जीवन विफल हो जाएगा । स्त्री-प्रेम मे फंसा व्यक्ति साहसी भी हो तो वह या तो किसी का वध करेगा या आत्महत्या कर लेगा। उससे गौरवपूर्ण लौकिक कार्य कुछ नहीं होगा । किसी युवक को किसी युवती के प्रति अपार प्रेम देखकर कोई पिता यह नहीं कहेगा कि शावास बेटा, तुम जितने अधिक स्त्रीलंपट बनोगे उतने ही अधिक ताजमहल बनाकर विश्व ने नाम पाओगे। अत: मुमताज पर असीम प्रेम होने के कारण शाहजहाँ द्वारा ताजमहल का निर्माण करना असंभव बात हैं । ईश्वर, माता या मातृभूमि मे जिसकी अपार निष्ठा या लग्न हो उसके हाथो बड़े-बड़े कार्य होते हैं ।  
  27.  सन् १९७३ के आरंभ मे ताजमहल के उद्धान मे लगाए अंग्रेज़ो के फब्बारे बंद पड़ गये । उनमे कुछ खरीबी आ गई थी । वह दुरुस्त करने हेतु जब खुदाई की गई तो अंदर अन्य प्राचीन फब्बारे निकले, उनका भी रुख संगमरमरी ताजमहल की दिशा मे ही था । 
  28. शाहजहाँ ने ताजमहल मे बड़ी लूटपाट और तोड़-फोड़ मचाई, बगीचे मे लगे हिन्दू पूजा वृक्ष तोड़े, छ्ह मंजिलों के सैकड़ो कक्ष बंद करवाने के लिए बगीचे मे ईट-पत्थर आदि के ढेर लगवाए । 
  29. उससे प्राचीन तेजोमहालय के हिन्दू फब्बारे टूट-फुट कर बन्द हो गए थे । इस कारण अंग्रेज़ो को नए फब्बारे लगवाने पड़े । अत: तेजोमहालय के बीचोबीच लगे फब्बारों की परंपरा प्राचीन हिन्दू है । सारी ऐतिहासिक इमारतों मे इस प्रकार की जल प्रवाह की जो नालियाँ, प्रपात, हौंद आदि बने हुए है वे वैदिक परंपरा के अनुसार हैं । अर्बस्थान, ईरान आदि वीरान प्रदेशो से भारत मे घुसे इस्लामी हमलावरो को तो इतना बहता पानी लगता था और न ही उन्हे सिचाई योजना का कोई ज्ञान या अनुभव था ।  
  30. ताजमहल के संगमरमरी चबूतरे पर खड़े-खड़े ऊपर भी एक मंजिल दिखती है । तथापि उसमे सामान्य प्रेक्षकों को प्रवेश नहीं मिलता । उस मंजिल पर पहुँचने के लिए दाएँ-बाएँ दो जीने है । उन्हे पुरातत्व खाते के ताले लगे रहते है । ऊपर के उन कक्षो मे फर्श पर और दीवारों पर जो संगमरमर लगा था वह शाहजहाँ द्वारा उखाड़ लिया गया । वह कुरनो की आयते जड़ने के और मुमताज के नाम की दो कब्रे बनाने के काम मे लाया गया । क्योकि पाँच सौ वर्ष पूर्व हिन्दुओ ने कहाँ से संगमरमर मंगवाकर ताजमहल बनवाया यह शाहजहाँ के कर्मचारी नहीं जानते थे । संगमरमर वाली निचली मंजिल के अतिरिक्त अन्य मंज़िले तो शाहजहाँ को बंद करवानी ही थी ताकि ऐरे-गैरे व्यक्ति उनका कब्जा न ले सके । उन कमरो की छत धुएँ से काली पड़ी हुई है । चाँदी के द्वार, सोने के खंभे आदि उखाड़ने के लिए जब शाहजहाँ के सैनिको ने ऊपर मुकाम किया तब उन्होने वहाँ आग लगाकर, धुएँ से छत को काला किया गया होगा । इस प्रकार शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण करने के बजाए तेजोमहालय को लूटकर उसे खराब किया । इस प्रकार इतिहास मे जिन इस्लामी आक्रामकों ने हिंदुस्तान की ऐतिहासिक इमारतों को तोड़ा-फोड़ा और लूटा । उनको उन इमारतों का निर्माता बतलाया जा रहा है । Destroyers     have been called builderअब भारत स्वतंत्र हो जाने के कारण ऊपर जाने के जीने प्रेक्षको के लिए खोल देने चाहिए । ऊपर वाले कक्ष छुपने की अब कोई आवश्यकता नहीं ।
  31. शाहजहाँ के समय बनिए नाम का एक फ्रेंच डॉक्टर आगरा नगर मे आया था । उसके लिखे संस्मरणों मे कहा गया है कि संगमरमरी तहखाने मे और उसकी निचली मंजिलों मे मुसलमानो के अतिरिक्त दूसरे किसी को जाने नहीं देते । कारण यह था कि अन्य मंजिलों से निकलने वाली मूर्तियो को शाहजहाँ ने निचली मंजिलों मे ठूंसकर उन मंजिलों पर मुसलमानो का पहरा लगा दिया था । 
  32. ताजमहल के पश्चिम प्रेवश द्वार के बाहर मिट्टी के ऊंचे-ऊंचे टीले बनाकर उन र वृक्ष लगा दिए गए है । प्राचीन काल मे जब तेजोमहालय परिसर के सैकड़ो कक्ष बने तब नीब की खुदाई से निकले मिट्टी के टीले वहाँ इस कारण बनाए गए कि किसी आक्रामक की चतुरंग सेना एकाएक पूरी सकती से हमला न कर सके । शत्रु सेना एक-एक या दो-दो की कतारों मे ही आगे बड़ सके । ऐसे विभाजित शत्रु सेना का प्रतीकार कुछ अधिक सरल हो जाता था । उन टीलो मे से अनेक शाहजहाँ ने हजारो मजदूर लगवाकर उठवा दिये ताकि पूरे सबारी के साथ ताजमहल पर पहुंचना सुगम हो और ताजमहल परिसर दूर से दिखाई दे । अंग्रेज़ यात्री पीटर मंडी यह ब्यौरा लिख रखा है । उससे स्पष्ट है कि ताजमहल परिसर शाहजहाँ के पूर्व ही बना था। टॅल्हरनिए नाम का फ्रेच सर्राफ जो शाहजहाँ के समय आगरा आया था ने लिखा है कि मचाण लगवाने के लिए लकड़ी उपलब्ध नहीं थी इस कारण शाहजहाँ को ईटों का ही मचाण बनवाना पड़ा । अत: कब्र पर जो खर्चा हुआ उसने मचाण का ही खर्चा सबसे आधिक हुआ । जिस शाहजहाँ को मचाण के लिए पर्याप्त लकड़ी भी उपलब्ध नही थी वह ताजमहल जैसी विशाल और सुंदर इमारत कैसे बना पाता ? टॅल्हरनिए के उस कथन का अर्थ यह है कि बने-बनाए ताजमहल पर जब शाहजहाँ मे दीवारों पर ऊपर-नीचे कुरान की आयते ड़ाना चाहा तो उसके लिए नीचे से ऊपर तक ईटों की चौड़ी दीवारो का ही मचाण बड़ा करना पड़ा । कुरान जड़ाने का खर्चा कम और मचाण का खर्चा बहुत अधिक अधिक ऐसा उल्टा हिसाब बना । इसी से स्पष्ट है कि शाहजहाँ द्वारा ६ मंजिलों के सैकड़ो कक्ष बंद करवाने का और दीवारों र कुरान की आयते जड़ाने का ही कार्य किया गया । 
  33. ताजमहल परिसर के दरवाजो को मोटी नोकदार कीले लगी हैं । हाथी द्वारा वे दरवाजे तोड़े न जा सके अत: उन्हे कीले लगाई जाती थी । यदि ताजमहल कब्र होती तो उसे कील वाले द्वार की कोई आवश्यकता नहीं थी । महल तथा मंदिरो मे जहाँ अपार संपत्ति सुरक्षित रखनी होती हैं वही ऐसे कीलदार द्वार लगाए जाते है ।  
  34. ताजमहल के पूर्व मे खाई बनी है । ताजमहल के पीछे भी यमुना परवाह जल भी भरी खाई का काम देती है । इस प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था दर्शाती है की ताजमहल मूलत: एक मामूली मकबरा नहीं अपितु एक प्रसिद्ध तेजोमहालय शिवतीर्थ था ।  
  35. ब्रिटिश ज्ञानकोप (Encyclopaedia Britannica) के अनुसार ताजमहल परिसर मे अतिथि गृह, पहरेदारों के कक्ष, अश्वशाला इत्यादि भी है । मृतक के लिए इन सबकी क्या आवश्यकता ?

भाग १ - http://jhindu.blogspot.in/2012/07/blog-post_15.html
भाग २ - http://jhindu.blogspot.in/2012/07/2.html
भाग ४- http://jhindu.blogspot.in/2012/07/blog-post_21.html

 

शेष भाग 4 में