Sunday, October 28, 2012

शून्यखर्च चुनाव प्रणाली (एक क्रन्तिकारी विचार)


इसे गंभीरता से पढ़कर अपने विचार प्रेरित करे ताकि राष्ट्र निर्माण में आप अपनी प्रत्यक्ष भूमिका निभा सकें।
यह विचार अंतिम नहीं है । यह तो प्रारम्भ हैं । इसमे कुछ भी सुधार संभव हैं । हम महानतम् भारत के निर्माता हैं । अत: हमे मिल बैठकर मार्ग खोजना ही होगा । 

देश की सभी समस्याओ का मूल हैं :  ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लूट के धन पर खड़ा संसदीय लोकतन्त्र
                              जिसकी नाभि का अमृत हैं,छद्मम छद् म चुनाव प्रणाली 

शून्य खर्च वाली चुनाव प्रणाली ही भारत देश की समस्त समस्यों का समाधान हैं। हर बस्ती / २०० परिवार / ग्राम सभा होगी विधान सभा। जिसमे हर परिवार से होगा एक जनप्रतिनिधि

वस्तुत: यह आंदोलन देश की सिकंदर के आक्रमण अर्थात २४०० वर्ष की सतत दुरावस्था से पीड़ित भारतीय समाज एवं योरुपीय लूट, पट एवं विस्तारवाद की नीति से उपजा एक आध्यात्मिक आन्दोलन हैं । जो राज्य-समाज व्यवस्था, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रो मे आयी गंदगी की सफाई के लिए कृत संकल्पित हैं । 

इस लोकतंत्र में चुनावो में वोट लवा कर जनता में भ्रम पैदा किया गया है की सरकार तो तुम ही चुनते हो, इसलिए दोषी भी तुम्ही हो । पहले तो ५४३ प्रत्याशी जो ५०-१०० करोड़ खर्च कर सके, वे धनकुबेर ही इस चुनाव में हमारे सामने होते हैं, फिर शराब, गुंडा गर्दी, जातिवादी दंगो का खेल शुरू होता हैं । इसके बाद भी जो प्रतिनिधि चुना जाता हैं, उसे भोगविलास की कानूनी छूट जनता के टैक्स के पैसे पर प्राप्त हैं । मंहगाई एवं भ्रष्टाचार की जड़ यही छिपी हैं । उसके बावजूद सांसद आदि किसी भी जनप्रतिनिधि को कोई अधिकार नहीं दिया गया हैं । सारे अधिकार प्रधानमंत्री में निहित हैं, जिसे जनप्रतिनिधि होना भी जरूरी नहीं हैं । जो मनोनीत ढंग से बन सकता हैं । देश को चलाने वाले सभी मुख्य पद मनोनीत हैं । उदाहरणार्थ: सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश, गवर्नर रिजर्व बैंक, उपाध्यक्ष योजना आयोग और चुनाव आयुक्त आदि । सारी जनता परिवर्तन के लिए कराह रही हैं । हजारो तरफ से ईमानदार प्रयास भी देश में हो रहे हैं । किन्तु क्या हजारो करोड़ के खर्च पर इस चुनाव प्रक्रिया को बदले बिना कोई भी परिवर्तन अपेक्षित परिणाम दे सकेगा ? 

सकारात्मक लोकतन्त्र में जनप्रतिनिधि का चयन (नगरग्राम स्वराज योजना)

स्वावलम्वी नगरग्राम, परंपरागत आत्मनिर्भर व्यवसाय, कोई नौकर नहीं, पूंजी नहीं श्रम प्रधान-अधिकार नहीं कर्तव्य आधारित व्यवस्था, साथ ही सृजनात्मकता एवं आत्मविकाश के लिए अतिरिक्त समय मिले यही है नए भारत की आधारशिला ।

यहाँ केंद्र में (वॉटर) व्यक्ति को नहीं, परिवार को रखा गया हैं । प्रशासन की प्रथम इकाई नगर और ग्राम के भेद को दूर करने वाली नगरग्राम कही जाएगी, जो पूर्णतया स्वावलंबी होगी, जिसमे १०० बस्तियाँ / ग्राम सभाएं होंगी। जिसमे अनुमानित २०० परिवार होंगे । गाँव / बस्ती / २०० परिवारों के २०० मुखिया अपने क्षेत्र के विकास के लिए एक साथ बैठेंगे, जिसे ग्राम विधान सभा (ग्रा॰वि॰स) कहा जाएगा । इसका नेतृत्व ५ सदस्यीय मंत्री परिषद करेगी ।     
  • मंत्री परिषद का चयन : ग्रा.वि.स. के सभी २०० सदस्य-वरीयता क्रम में ५ नाम लिखकर बाक्स में डालेंगे । जिनका मूल्यांकन होगा
  •  I -100, II - 80, III - 60, IV 40, V – 20.
  •  तुरंत ही सबके समक्ष बाक्स खुलेगा, सभी मत पत्रो पर दिये गए वरीयता नामो के आगे अंक लिखते जाएंगे । पूरे २०० मत पत्र खुलने के बाद सभी को प्राप्त अंको का योग हो जाएगा । सर्वाधिक अंक प्राप्त ५ व्यक्ति मंत्री होंगे । इस प्रकार ५ सदस्यीय मंत्री परिषद का चयन हो जायेगा ।
नगरग्राम स्वराज्य        
  • नीचे की प्रत्येक इकाई के मंत्री ऊपर की इकाई के लिए साधारण सदस्य होंगे ।
  • नगरग्राम १०० बस्तियो की १ लाख आबादी वाली इकाई होगी। 
नगरग्राम / विधान सभा की सदस्य संख्या = १०० बस्तियो के पाँच मन्त्री अर्थात १००x५ = ५००
यह ५०० सदस्य पूर्ववत्त वरीयता मत प्रणाली से पुनः ५ सदस्यीय मंत्री परिषद का चयन करेंगे । सर्वाधिक अंक प्राप्त प्रथम व्यक्ति नगरग्रामपाल, शेष उनके चार मंत्री होंगे ।
  • कृषि, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, प्राथमिक रोजगार, रोटी की गारंटी एवं अपने विकास के लिए आर्थिक अधिकाओ से युक्त यह स्वायत्तईकाई होगी, जो औसतन १ लाख आबादी या २० हजार परिवारो वाली होगी । इसी प्रकार जनपद (१० नगरग्राम), प्रांत (१०० नगरग्राम) एवं देश के बारे में भी कार्यवाही होगी। सभी ईकाइयो की परिधि में आये दायित्वों के लिए वही स्वायत्त ईकाई होगी । नगरग्राम का औसत क्षेत्रफल १० कि.मी त्रिज्या वाला होगा। जिससे किसी भी प्रशासनिक अधिकारी या राजनेता को सरकारी वाहन अथवा आवास देने की आवश्यकता नहीं रहेगी । इस प्रकार बजट का खर्च ८०% तक कम किया जा सकेगा।
  • इसी प्रकार १०० नगरग्राम अर्थात एक करोड़ आबादी वाले १२० प्रांत होंगे । प्रांतीय मंत्री परिषदों के १२०x५ = ६०० सदस्य राष्ट्रीय प्रतिनिधि सभा (संसद) होगी अर्थात राज्य सभा/विधान परिषद/मनोनीत जैसे पिछले द्वारो से गलत व्यक्ति का प्रवेश बंद हो जाएगा।
इस व्यवस्था में सबको समान शिक्षा की गारंटी है जो चार चरणों में विभक्त होगी । क्रमशः चौथे चरण तक पहुंचे उच्चीकृत विधार्थी वर्ग शिक्षक, वैज्ञानिक एवं विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ आदि होंगे इनमे अपरिंगही शिक्षाविदों का वर्ग मा.उ.प. कहा जाएगा जो राज्य व्यवस्था के लिए मार्गदर्शक संस्था होगी । 

विचार - भारत उत्थान परिषद, झाँसी

1 comment:

  1. विचार अच्छे हैं, इसीलिये हर अच्छे काम की तरह इनके कार्यान्वयन में कठिनाईयां भी दिखती हैं। शुरुआत छोटे स्तर से की जा सकती है, वैसे वर्तमान व्यवस्था में भी कुछ राज्य सरकारें निर्विरोध चयनित पंचायतों को प्रोत्साहन-राशि देती हैं।

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