Sunday, February 12, 2012

अजर, अमर हम अविनाशी


यूनानी साहित्य में एक मृत्युंजयी पक्षी ‘फीनिक्स’ की चर्चा आती है। उसके बारे में मान्यता है कि अपनी राख में से वह फिर-फिर जीवित हो जाता है।

दुनिया के गत लाखों वर्ष के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि भारत वर्ष और हिन्दू समाज भी मृत्युंजयी है। फीनिक्स पक्षी तो काल्पनिक है; पर हिन्दू समाज इस धरा की जीवित-जाग्रत वास्तविकता है। हिन्दुओं पर हजारों आपदाएं आयीं। इससे असीमित धन, जन, भूमि, सत्ता और मान-सम्मान की हानि भी हुई; पर वह फिर उठ खड़ा हुआ। ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ कहकर हमारे विरोधी भी इसे स्वीकार करते हैं।

उतार-चढ़ाव सृष्टि का सनातन नियम है। दुनिया में जय-पराजय हर देश और समाज को समय-समय पर झेलनी पड़ी हैं। हमारे साथ तो यह कुछ अधिक ही हुआ है; पर हमने एक दिन के लिए भी पराजय को मन से स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, तो हमने हजारों वर्ष तक चले संघर्ष में उन अमर बलिदानियों और हुतात्माओं को अपने देश व धर्म के लिए गौरव और प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।

बलिदान की यह परम्परा तब से ही प्रारम्भ हो गयी, जब से शक, हूण, तुर्क, पठान, मुगल आदि विदेशी और विधर्मियों के हमले भारत पर होने लगे। इस्लामी हमलावरों के काल में राजा दाहिरसेन की पुत्रियां सूर्या और परिमल, गुरु अमरदास, गुरु तेगबहादुर और चारों गुरुपुत्र, बन्दा बैरागी, हकीकत राय जैसे हजारों बलिदानियों के प्रेरक प्रसंगों से इतिहास भरा है।

राजस्थानी जौहर की गाथाएं सुनकर किसका मस्तक गर्व से ऊंचा नहीं हो जाता ? उन वीर माताओं ने जान देना स्वीकार किया; पर आन नहीं। अंग्रेजों और पुर्तगालियों ने भी इस बर्बरता को दोहराया। भारत का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां इन्होंने हत्या, अग्निकांड और दुराचार का नंगा नाच न किया हो। गत शती की जलियांवाला बाग (अमृतसर) और मानगढ़ (राजस्थान) जैसे अनेक सामूहिक नरसंहारों की गाथाएं भी लोककथाओं और लोकगीतों में जीवित हैं।

लेकिन इतना सब होने के बाद भी इन बलिदान पर्वों पर हम हर साल काले कपड़े पहनकर छाती नहीं पीटते। उत्सवप्रिय हिन्दू समाज ने इन दुखद प्रसंगों को भी प्रेरणा और गौरव के पर्वों में बदल दिया है। प्रायः हम मेले लगाकर उस दिन को याद करते हैं। जगह-जगह भोजन और शरबत के लंगर तथा सेवा के शिविर लगाकर उन बलिदानियों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।

हम ‘पुरानी नींव नया निर्माण’ की कहावत के अनुसार पिछली घटनाओं और दुर्घटनाओं से प्रेरणा लेकर आगे देखने में विश्वास रखते हैं। मुस्लिम और ईसाई हमलावरों ने भारत में हजारों मंदिर तोड़े। हमने उनमें से कई को पहले से भी अधिक भव्य रूप में फिर बना लिया। अब हम विध्वंस के बदले उनके पुनर्निमाण के दिन को याद कर उत्सव मनाते हैं।

लेकिन इसके दूसरी ओर अरब जगत को देखें, तो 1400 साल पूर्व हुए एक युद्ध को याद कर, पराजित गुट के अनुयायी आज तक रोते हैं। कुछ लोग उसे भले ही सत्य और असत्य के युद्ध जैसा कोई अच्छा नाम दें; पर वह विशुद्ध सत्ता का संघर्ष था। उसमें एक गुट को हारना ही था। एक गुट ने अपनी कबीलाई बर्बरता दिखाते हुए दूसरे गुट के बड़ों ही नहीं, तो बच्चों को भी तड़पा-तड़पा कर मारा।

पराजित लोग भले ही इसे अमानवीय कहें; पर उनके अपने क्रूर कर्मों से भी इतिहास के लाखों पृष्ठ भरे हैं। बिना बात मरने और निहत्थे-निरपराध लोगों को मारने का उनका स्वभाव आज भी बना है। जेहादी और आत्मघाती हमलों से वे सब कुछ नष्ट करने पर तुले हैं। दुनिया में आतंक का मुख्य कारण यह मानसिकता ही है।

हिन्दुओं की जीवंतता और उत्सवप्रियता पर एक और दृष्टि से विचार करें। ईश्वर एक होने पर भी हिन्दू कण-कण में उसे देखता है। उसकी दृष्टि में पशु, पक्षी, मानव, जलचर, पेड़, पौधे, धरती, जल, वायु, अग्नि, आकाश..सबमें भगवान है। हम हजारों पंथ, मत, सम्प्रदाय और देवी-देवताओं को मानते हैं। ईश्वर अजन्मा, अजर और अमर है; पर उसके कई अवतारों ने अपनी लीलाओं से इस धरा को पवित्र किया है। हम इन सब रूपों की पूजा करते हैं।

अवधबिहारी श्रीराम और मथुरानंदन श्रीकृष्ण के बालरूप की महिमा सुनने और गाने में किसे आनंद नहीं आता ? जब तुलसीदास ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनिया गाते हैं, तो सबका मन श्रीराम को गोद में उठाकर दुलारने का हो उठता है। धनुष यज्ञ से पूर्व राजा जनक और जानकी के मन का असमंजस हर व्यक्ति को अपना सा लगता है। जब श्रीराम अपनी प्राणप्रिया के वियोग में रोते हुए वन-वन भटकते हैं, तो सबकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।

इसी प्रकार जब सूरदास यशोदा हरि पालने झुलावे गाते हैं, तो बच्चे से लेकर बूढ़े तक बालकृष्ण के पालने की डोरी में हाथ लगाकर उन्हें सुलाने का श्रेय लेने को उमग उठते हैं। जब यशोदा कृष्ण को ऊखल से बांधती है, तो सबके मन में कृष्ण के प्रति करुणा उत्पन्न हो जाती है। कंस का वध करते समय और महाभारत में गीता सुनाते समय श्रीकृष्ण सबको गौरव से भर देते हैं।

हमारे भगवान का क्या कहना ? वे हंसते हैं, तो रोते भी हैं। वे नाचते हैं, तो गाते भी हैं। घर में बच्चों की बालसुलभ शरारतों को देखकर हम भगवान को तथा मंदिर में बाल भगवान की मूर्ति देखकर अपने बच्चों को याद कर लेते हैं। भगवान के कण-कण और हर प्राणी में विद्यमान होने का यही तो अर्थ है। कीर्तन करते हुए तेरा-मेरा का भेद मिटाकर भक्त और भगवान एकरूप हो जाते हैं।

दूसरी ओर ईसा मसीह या इस्लाम के पैगम्बर के सौम्य रूप की चर्चा प्रायः कहीं नहीं है। ईसा मसीह का सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्र वही है, जिसमें वे रक्तरंजित अवस्था में सूली पर लटके हैं। इस्लाम के पैगम्बर का जीवन तो युद्धों में ही बीता। इसीलिए मुसलमान चाहे जिस देश में हों, किसी न किसी से लड़ ही रहे हैं। दूसरे नहीं मिलते, तो वे आपस में ही लड़ते हैं।

गत 2,000 साल का अनुभव बताता है कि किसी नगर, गांव या कबीले पर कब्जे के लिए हुआ आपसी संघर्ष; या मृत्युदंड पाये, सलीब पर लटके ईसा मसीह किसी को सत्य, अहिंसा और प्रेम की शिक्षा नहीं दे सकते। इसलिए इन दोनों मजहबों के अनुयायी अपने जन्मकाल से ही दुनिया के अधिकाधिक जन, धन और भूमि पर कब्जा करने के लिए लड़ रहे हैं। विश्व में अशांति का यही कारण है।

क्या यह कटु सत्य नहीं है कि किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र नहीं है। कुछ स्थानों पर वह दिखावे के लिए है; पर वहां कब सेना या तालिबानी हावी हो जाएं, कहना कठिन है। अपनी वैचारिक असफलता को छिपाने के लिए वहां मरने और मारने का खुला खेल जारी है। कौन, कब, किसे मार दे; कुछ पता नहीं। पिछले दिनों कई इस्लामी देशों में तानाशाही सत्ता के विरुद्ध विद्रोह हुआ है; पर वह भी किसी सार्थक निष्कर्ष पर पहुँचता नजर नहीं आता।

अधिकांश ईसाई देशों में लोकतंत्र है; पर इसकी आड़ में द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व ब्रिटेन और अब अमरीका पूरी दुनिया को लूटने और बरबाद करने पर तुला है। वे अपने धन और शस्त्रों के बल पर भले ही दुनिया को दबा कर रखें; पर यह भी सत्य है कि वहां चर्च बिक रहे हैं। चर्च में जाने वालों की संख्या लगातार घट रही है। इस कमी को वे अपने धनबल से भारत जैसे देशों में मतान्तरण द्वारा पूरा करना चाहते हैं।

चर्च के बंधन टूटने से वहां सब मर्यादाएं मिट रही हैं। परिवार व्यवस्था के बाद अब विवाह व्यवस्था भी समाप्त होने को है। ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के नाम पर खुला व्यभिचार चल रहा है। बुढ़ापे में देखरेख की जिम्मेदारी जब शासन की है, तो बच्चे क्यों पैदा करें ? इस सोच से ईसाई देशों की जनसंख्या घट रही है। इससे चिंतित होकर अब वे अधिक बच्चे पैदा करने वाले दम्पतियों को पुरस्कृत करने लगे हैं। केरल का चर्च भी इसी दिशा चल रहा है।

मिशनरी और पादरी चाहे कुछ भी कहें; पर सलीब पर लटका, ईश्वर का तथाकथित पुत्र, युवा वर्ग की मानसिक और आत्मिक भूख अब शांत नहीं करता। इसके बदले हंसता-खेलता, रोता-लड़ता और शरारत करता बालकृष्ण उन्हें अच्छा लगता है। इसलिए पश्चिमी देशों में ‘हरे कृष्ण आंदोलन’ बहुत लोकप्रिय हो रहा है। हर नगर में कीर्तन करते, धोती पहने गौरांग लोग, भाव विभोर होकर नाचते नजर आते हैं। रूस में गीता के विरोध का कारण भी यही है।

हिन्दू धर्म की विशेषता उसका लचीलापन है। हमने देश, काल, और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को बदला और सुधारा है; पर मजहबवादी आज भी लकीर के फकीर बने हैं। किसी ने कहा है - झुकेगा वही, जिसमें कुछ जान है, अकड़ खास मुर्दे की पहचान है।।

हम जीवन को याद रखते हैं, मृत्यु को नहीं। हम बलिदान को याद रखते हैं, सत्ता के बर्बर संघर्ष में हुई मौतों को नहीं। हम ‘जियो और जीने दो’ के पुजारी हैं, ‘मारो और मरो’ के नहीं। जो जीवन की पूजा करते हैं, वे कभी मरेंगे नहीं। भले ही कालक्रम में उन्हें कुछ सौ या हजार साल पराजय और गुलामी का दंश झेलना पड़े। जो मृत्यु के पुजारी हैं, वे मिट कर ही रहेंगे। भले ही वे कुछ सौ या हजार साल जीतते हुए दिखाई दें।

सृष्टि का यह सनातन नियम है। इसीलिए हम अजर, अमर और अविनाशी हैं। ऐसे संकट पहले भी आये हैं, जिन्हें हमने हर बार कुचला है। इस बार भी ऐसा ही होगा। बस, आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दू धर्म की जिन विशेषताओं की चर्चा हम मुंह से करते हैं, अपने धर्मग्रन्थों से प्रेम और सामाजिक समरसता के जो उद्धरण हम प्रायः देते हैं, उन्हें व्यवहार में लाना प्रारम्भ कर दें।
(लेखक : ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक के पूर्व सहायक सम्पादक हैं)

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर आलेख। सनातन धर्म भले ही सिमटता जाये पर कभी नहीं मिटेगा।

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  2. जब तक राष्ट्र पर मर मिटने वाले बलिदानी इस भारत में है तब तक तो यह अशंभव है ही !

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