Sunday, January 15, 2012

डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी (राष्ट्र एवं धर्मप्रेमी योद्धा )


वर्तमानमें इस देशपर राष्ट्रघाती एवं भ्रष्टाचारी राज्य कर रहे हैं । ऐसे राष्ट्रघाती एवं भ्रष्टाचारियोंको सत्तासे हटाकर राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमियोंको सत्ता सौंपना आवश्यक है । आज देशकी १२० करोड जनतामें राष्ट्र एवं धर्मप्रमी कितने एवं कहां है, ऐसा प्रश्न जनताके मनमें आना स्वाभाविक है । ज्येष्ठ समाजसेवक श्री. अण्णा हजारे एवं योगऋषि रामदेवबाबा दोनों उनके संगठनद्वारा राष्ट्रका एवं कुछ मात्रामें धर्मका कार्य कर रहे हैं । इस समय राष्ट्र एवं धर्मका वैध मार्गसे अकेले सिपाहीके समान विगत ४०वर्षोंसे कार्य करनेवाले एक नामकी उपेक्षा हो रही है । वह नाम है जनता पक्षके अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामीका !
लोकनायक जयप्रकाश नारायणकी प्रेरणासे डॉ. स्वामीने राष्ट्रकार्यमें स्वयंको समर्पित किया । उनकी प्रेरणासे ही वे कभी जय-पराजयसे निराश नहीं हुए एवं उन्होंने संघर्ष जारी रखा । उन्होंने संघर्षके अच्छे-बुरे प्रभाव पर भी ध्यान नहीं दिया । डॉ. स्वामीके गुरु कांची कामकोटी पीठके शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती (वर्तमान समयके शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वतीके गुरु) के आशिर्वाद एवं  जयप्रकाश नारायणद्वारा किएर्भयतासे खडे होकर बोल पा रहे हैं । ऐसे राष्ट्र एवं धर्मके लिए कार्यरत निर्भय व्यक्तित्वके विभिन्न पहलु देखें -

जन्म एवं बाल्यावस्था

अ. बाल्यावस्थासे ही राजनीतिज्ञोंसे संबंध : डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामीका जन्म १५ सितंबर १९३९ को चेन्नईके मायलापूर नामक सांस्कृतिक शहरमें हुआ । उनके पिता सीताराम सुब्रह्मण्यम भारतीय प्रशासकीय अधिकारी थे । वे भारत शासनके ‘सचिव’ पदसे निवृत्त हुए । उनकी मां केरलके एक सुसंस्कृत तामिल घरानेसे थी । सीताराम सुब्रह्मण्यम शासकीय सेवामें होनेके कारण डॉ.स्वामीकी शिक्षा राजधानी दिल्लीमें संपन्न हुई । डॉ. स्वामीके पिताके सत्यमूर्र्ति, थिरू कामराज इत्यादि बडे राजनीतिज्ञोंसे निकटवर्ती संबंध थे, तथा वरिष्ठ शासकीय अधिकारी होनेके कारण शासनद्वारा उन्हें दिल्लीके ‘राजेंद्र प्रसाद मार्ग’ पर शासकीय निवास प्रदान किया गया था । यहां बिहारके संसद सदस्य शामानंदन सहाय, भूतपूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम इत्यादि बडे राजनेताओं निवासस्थान होनेके कारणे उनका एवं डॉ. स्वामीके पिताका एक दूसरेके यहां आना-जाना था ।
आ. शंकानिरसन न होनेसे यज्ञोपवीत धारण करनेसे मना किया : एक बार जगजीवन रामने डॉ. स्वामीसे प्रश्न किया कि आप ब्र्राह्मण होकर आपके गलेमें यज्ञोपवीत क्यों नहीं है ?’’ इसपर डॉ. स्वामीने बताया कि ७ वर्षकी आयुमें उनका उपनयन संस्कार किया जा रहा था । उस समय जिज्ञासू वृत्तिसे उन्होंने पंडितसे प्रश्न किया कि उनके वर्गमित्र यज्ञोपवीत (जनेऊ) नहीं धारण करते फिर वे क्यों धारण करें ? पंडितके उत्तरसे उन्हें संतुष्टि नहीं हुई । उन्होंने पंडितसे अनेक प्रश्न पूछे, जिससे घरमें सब लोग अस्वस्थ हो गए तथा उनके पिताजीने वह विधि ही निरस्त किया । इससे मां दुखी थी; परंतु डॉ.स्वामीने ठान लिया था कि जबतक उनके प्रश्नोंका पंडितसे संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, वे यज्ञोपवीत धारण नहीं करेंगे । इस उत्तरसे जगजीवन राम अत्यधिक प्रभावित हुए । (तत्पश्चात् डॉ.स्वामीके गुरु शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वतीने अच्छा मुहूर्त देखकर यह विधि करवा लिया एवं आध्यात्मिक विधिमें यज्ञोपवीतका शास्त्र एवं महत्त्व बताया ।)

शिक्षा

अ. उच्चविद्याविभूषित डॉ. स्वामी : डॉ. स्वामीने दिल्ली विश्वविद्यालयमें हिंदु महाविद्यालयसे गणित विषयमें उपाधि प्राप्त की । तत्पश्चात् उन्होंने कोलकाताके इंडियन स्टॅटिस्टिकल इंन्स्टिट्यूट (भारतीय सांख्यिकी संस्था) से सांख्यिकी विषयमें उच्च उपाधि प्राप्त की । वहां पढते समय डॉ. स्वामीने भारतीय सांख्यिकी संस्थाके संचालक प्रसंत महालनोबीसद्वारा किए गए अन्वेषणको आवाहन किया था । उनके शैक्षणिक प्राविण्यसे प्रभावित होकर इंग्लैंडके विश्वविख्यात हॉवर्ड विश्वविद्यालयद्वारा उन्हें अन्वेषण करने हेतु आमंत्रित किया गया ।


आ. नोबल पारितोषिक प्राप्त विद्वानोंके साथ अन्वेषण : हॉवर्ड शैक्षणिक संस्थामें पढते हुए डॉ. स्वामीने नोबेल विजेता सायमन कुझनेटस एवं नोबेल विजेता पॉल स्यामूल्सन इन विद्वानोंके साथ काम किया । डॉ. स्वामीने १९६४ में अर्थशास्त्र विषयमें केवल १८ महिनेमें ‘डॉक्टरेट’की उपाधि प्राप्त की ।

शैक्षणिक क्षेत्रमें कार्य

अ. विदेशी एवं देशी शिक्षा संस्थाओंमें प्राध्यापकी : हॉवर्डमें अर्थशास्त्र विषयमें डॉक्टरेट प्राप्त करनेपर वहींपर अर्थशास्त्र पढानेके लिए उन्हें सहायक प्राध्यापक पदपर नियुक्त किया गया । डॉ. स्वामीने हॉवर्डमें १० वर्ष अलग-अलग कालावधिमें प्राध्यापकके रूपमें काम किया । अभी भी वे हॉवर्डके ग्रीष्मकालीन सत्रमें अर्थशास्त्र पढानेके लिए जाते हैं । उन्होंने १९६९-१९९१ इस कालावधिमें भारतीय तंत्रज्ञान संस्था दिल्ली (आय.आय.टी.) में अर्थशास्त्रके पूर्णकालीन प्राध्यापकके रूपमें कार्य किया । १९७० में इंदिरा गांधीने डॉ. स्वामीको बलपूर्वक एवं अवैधानिक रूपसे प्राध्यापक पदसे निष्कासित कर दिया । १९८० में सर्वोच्च न्यायालयद्वारा डॉ.स्वामी पुनः प्राध्यापकके पदपर नियुक्त किए गए । १९९१ मेंउन्होंने वेंâद्रीय मंत्रीपद विभूषित करने हेतु प्राध्यापक पदसे त्यागपत्र दिया । डॉ. स्वामीने १९७७ से १९८० के मध्य ‘भारतीय तंत्रज्ञान संस्था दिल्ली’ शैक्षणिक संस्थाके संचालक मंडलमें कार्य किया । उसी प्रकार १९८० से १९८२ तक भारतीय तंत्रज्ञान संस्थाके परिषदमें काम किया है । वर्तमान समयमें वे केरलमें संचार एवं व्यवस्थापन व्यापार संस्था नामक शिक्षा संस्थाके संचालक हैं ।
आ. डॉ. स्वामीके अर्थविषयक संकल्पनासे भारतीय अर्थव्यवस्थाकी पुनर्रचना : डॉ. स्वामीने हॉवर्ड एवं भारतमें किए गए अन्वेषणके कारण वे विश्वविख्यात अर्थतज्ञके रूपमें जाने गए । डॉ. स्वामीने उनके ‘भारतीय आर्थिक नियोजन - एक वैकल्पिक दृष्टिकोण’ (इंडियन इकॅनॉमिक प्लानिंग, अ‍ॅन अल्टरनेटिव्ह अप्रोच ) नामक प्रथम पुस्तकमें भारतीय अर्थव्यवस्थाके लिए एक स्पष्ट पर्याय प्रस्तुत किया था । उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीने लोकसभामें अर्थसंकल्पीय अधिवेशनमें प्रश्नोत्तरकी कालावधिमें इस पुस्तकमें प्रस्तुत संकल्पनाका विरोध करनेका निर्णय लेकर पुस्तककी समीक्षा की । (तदुपरांत १९९० में डॉ. स्वामीद्वारा प्रस्तुत की गई संकल्पनासे भारतीय अर्थव्यवस्थाकी पुनर्रचना की गई एवं भारतीय अर्थव्यवस्था विकसित हुई ।)
इ. पुस्तक एवं शोधप्रबंधको वैश्विक प्रसिद्धि : ‘शिकागो विश्वविद्यालय समाचार संस्थाद्वारा १९७३ में ‘भारत एवं चीन १९५२-१९७० आर्थिक विकास : एक तुलनात्मक मूल्यांकन’ इस डॉ. स्वामीद्वारा प्रकाशित शोधप्रबंधकी पूरे विश्वके अर्थतज्ञोंद्वारा प्रशंसा की गई । डॉ. स्वामी एवं आधुनिक अर्थशास्त्रके जनक पॉल स्यामूल्सनने मिलकर ‘थेअरी ऑफ इंडेक्स नंबर्स (सूचकांक संख्या सिद्धांत)’ इस विषयपर लिखा हुआ शोधनिबंध अमेरिकन इकॉनॉमिक रिव्हाइव्ह (१९७४) एवं रॉयल इकॉनॉमिक सोसायटीकी आर्थिक पत्रिका (१९८४) ने प्रकाशित किया था । डॉ. स्वामीका यह अभूतपूर्व प्रबंध विश्वमें एक नए आर्थिक सिद्धांतके रूपमें मान्य हुआ । डॉ. स्वामीद्वारा भारत एवं चीनके परमाणु संबंधपर लिखी गई ‘भारत एवं चीन : एक तुलनात्मक मूल्यांकन’ यह दूसरी पुस्तक विकास प्रकाशन संस्थाद्वारा प्रकाशित की गई है ।
ई. डॉ. स्वामीकी नोबल पारितोषिक प्राप्त करनेकी पात्रता : विश्वविख्यात विश्वविद्यालय 'हॉवर्ड'में डॉ. स्वामीने नोबेल विजेता सायमन कुझनेटस एवं पॉल स्यामूल्सन इन विद्वानोंके साथ काम किया । डॉ. स्वामी अर्थशास्त्रके प्राध्यापक थे, तब दोनों विद्वानोंने ऐसा कहा था कि यदि डॉ. स्वामीने इससे पूर्व प्रसिद्धि प्राप्त सूचकांक संख्या सिद्धांत (थिअरी ऑफ इंडेक्स नंबर्स) विषयपर इसी प्रकार अन्वेषण जारी रखा, तो उन्हें भी नोबेल पारितोषक निश्चित मिलेगा ।

राज्यकालका प्रारंभ

अ. लोकनायक जयप्रकाश नारायणकी भेंटसे जीवनमें परिवर्तन : लोकनायक जयप्रकाश नारायणके साथ हॉवर्डमें हुई अभूतपूर्व भेंटसे डॉ. स्वामीका जीवन परिवर्तित हो गया एवं वे शिक्षा जगतसे राजनीतिकी ओर मुडे । जयप्रकाश नारायणकी भेंट होनेके पश्चात् डॉ. स्वामी राजनीतिक क्षेत्रमें ध्येय प्राप्तिकी भावनासे प्रेरित हुए एवं उसपर उन्होंने ध्यान केंद्रित किया ।
आ. जनता पक्षके संस्थापक सदस्य : १९७० में इंदिरा गांधी साम्यवादी विचारधाराके लोगोंसे प्रभावित हुर्इं एवं तानाशाही करने लगी । उस समय दिल्लीके भारतीय तंत्रज्ञान संस्थामें अर्थशास्त्रके पूर्णकालीन प्राध्यापक डॉ. स्वामीको साम्यवादी विचारधाराके लोगोंद्वारा डाले गए दबावके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीने अवैधानिक रूपसे अपनी सत्ताका दुरुपयोगकर प्राध्यापक पदसे उन्हें हटा दिया । डॉ. स्वामीने इंदिरा गांधीकी इस तानाशाहीका सभी प्रकारसे विरोध करनेका निश्चय किया । १९७६ में इंदिरा गांधीद्वारा लगाए गए आपातकालके कारण राजनीतिमें परिवर्तन लानेका डॉ. स्वामीने निश्चय किया । यहींसे डॉ. स्वामीकी राजनीति वास्तविक रूपसे प्रारंभ हुई । तत्पश्चात् वे जनता पक्षके संस्थापक बने । आज डॉ. स्वामी भारतीय लोकतंत्रके इतिहासमें आमूल परिवर्तन लानेवाले जनता पक्षके अध्यक्ष हैं ।

डॉ. स्वामीद्वारा आपातकालमें किया गया कार्य

अ. विदेशमें जाकर आपातकालका विरोध :१९७६ में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकालमें डॉ. स्वामीका साहसी विदेशगमन, वहांसे वापस आनेपर संसदमें उनकी नाटकीय उपस्थिति, वहांसे सुरक्षित रूपसे स्वयंको मुक्त कर पुनः विदेशगमन करनेके कारण अत्यधिक विख्यात हुए । पुलिसद्वारा फरार (मोस्ट वाँटेड) घोषित करनेपर भी डॉ. स्वामी सुरक्षित रूपसे विदेश जानेमें सफल हुए । वहां उन्होंने अनिवासी भारतियोंका संगठन कर ‘फ्रेंड ऑफ इंडिया’ (भारतके परदेशमें स्थित मित्र) नामक संगठन स्थापित कर आपातकालका विदेशसे विरोध किया ।


आ. विदेशी समाचारपत्रों द्वारा हस्तक्षेप  : डॉ. स्वामीके इस क्रांतिकारक कार्यपर पूरे विश्वके समाचार पत्रोंने ध्यान दिया एवं भारतके सभी स्तरके लोगोंने उनकी प्रशंसा की । अमेरिकाके ‘वॉशिंग्टन पोस्ट’ इस
समाचारपत्रद्वारा ‘आपातकाल एक मजाक बन गया है’, ऐसा समाचार प्रकाशित किया गया था । इस घटनासे इंदिरा गांधीको कुछ महीनोंमें सार्वजनिक चुनाव घोषित करने पडे एवं उसमें वे पराजित हुर्इं ।

डॉ. स्वामी : एक उत्कृष्ट प्रशासक

अ. विभिन्न मतदानकेंद्रसे ५ बार निर्वाचित होनेवाले प्रथम संसद सदस्य : सर्वप्रथम डॉ. स्वामी जनसंघसे १९७४ में उत्तरप्रदेश राज्यसभामें चुनकर आए । आपातकालके पश्चात् १९७७ में एवं तत्पश्चात् पुनः हुए चुनावमें डॉ. स्वामी मुंबईके उत्तर-पूर्व (घाटकोपर) मतदानकेंद्रसे दो बार निरंतर चुने गए । उन्होंने मतदानवेंâद्रके विकासके लिए विभिन्न कार्य एवं जनसम्पर्क किए, जिसके कारण अबतक लोग उनका स्मरण करते हैं । १९८८ से १९९४ इन ६ वर्षोंकी कालावधिमें उन्होंने राज्यसभामें उत्तरप्रदेश मतदानवेंâद्रका प्रतिनिधित्व किया । मार्च १९९८ में वे तामिलनाडूके मदुराई मतदानकेंद्रसे लोकसभाके चुनावमें चुनकर आए । इस प्रकार ५ बार विभिन्न मतदानवेंâद्रोंसे चुनकर आनेवाले प्रथम लोकप्रतिनिधि हुए ।
आ. एल.टी.टी.ईका बंदोबस्त करना : १९९०-९१ में प्रधानमंत्री चंद्रशेखरके मंत्रीमंडलमें कानूनमंत्रीके पदका कार्यभार संभालते हुए तामिलनाडूके एल.टी.टी.ई (लिबरेशन टायगर्स आर्पâ तमिल ईलम) इस आतंकवादी संगठनको जडसे उखाडने हेतु उन्होंने सेनाका उपयोग किया, जिससे तामिलनाडूमें ‘भारतका एक संरक्षक’ के रुपमें उनकी छवि निर्माण हुई ।
इ. विभिन्न देशोंसे ऐतिहासिक व्यावसायिक अनुबंध करना : डॉ. स्वामीके मंत्रीपदके कार्यकालमें उन्होंने चीन, अफगानिस्तान एवं पोलेंड इत्यादि देशोंसे ऐतिहासिक व्यापारी अनुबंध किए ।
ई. सत्ताधारी कांग्रेस पक्षद्वारा विरोधी पक्षके डॉ. स्वामीको केबिनेट मंत्रीका स्तर दिया जाना : १९९४ में तत्कालीन पंतप्रधान पी.व्ही.नरसिंह रावद्वारा डॉ. स्वामीकी ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं कामगार नीति आयोग’के संचालक पदपर नियुक्ति की गई । भारतके इतिहासकी यह प्रथम घटना थी कि एक सत्ताधारी पक्षद्वारा विरोधी पक्षके नेताको केंद्रीय मंत्रीका स्तर दिया गया । इससे डॉ. स्वामीकी कुशलता स्पष्ट होती है । इस पदपर काम करते समय डॉ. स्वामीने कामगारों तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमोंमें अत्यधिक सुधार किए, जिससे भारतके निर्यात क्षेत्रको भारी मात्रामें लाभ हुआ ।
उ. भारतके अंतर्राष्ट्रीय संबंध सुधारनेमें डॉ. स्वामीका योगदान : १९७८ से १९८५ में भारतकी चीनके साथ विदेश नीति पुनर्गठित करनेका महान कार्य डॉ. स्वामीने किया । उनके अथक प्रयासोंके कारण भारतकी चीनके साथ विदेश नीति एक शत्रुराष्ट्रसे एक साधारण पडोसी राष्ट्रमें रूपांतरित हुई एवं दोनों देशोंद्वारा इसका पूरा श्रेय डॉ. स्वामीको दिया गया । १९७८ से १९९८ इस कालावधिमें डॉ. स्वामीने कुल ७ बार विभिन्न राजनीतिक संबंध स्थापित करने हेतु चीनको भेंट दी ।
ऊ. चीन एवं इस्राईल देशोंको अधिकृत भेंट देनेवाले प्रथम राजकीय नेता : तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाईके सहकार्यसे डॉ. स्वामी चीन एवं इस्राईल देशोंको भेंट देनेवाले प्रथम भारतीय नेता सिद्ध हुए । १९८२ में इस्राईल देशमें सार्वजनिक रूपसे यात्रा करनेवाले प्रथम भारतीय राजनेता थे । इस्राईलमें उन्होंने रॉबिन, तत्कालीन पंतप्रधान मेनाचीन बेगीं एवं अनेक महत्त्वपूर्ण राजनेताओंसे भेंट की जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशोंद्वारा एक- दूसरेके देशमें दूतावास आरंभ हुए एवं मित्रताके सबंध स्थापित हुए ।
ए. विदेशनीतिपर लेखन करना : दक्षिण अफ्रीका, इंग्लेंड, पोलेंड, नामिबिया, चीन, इस्राईल इत्यादि अनेक देशोंके साथ मित्रताके सबंध स्थापित करनेमें डॉ. स्वामीका महत्त्वपूर्ण योगदान है । डॉ. स्वामीने भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान, भारत-इस्राईल आदि देशोंके साथ विदेशनीतिपर अत्यधिक लेखन भी किया है ।
ऐ. संयुक्त राष्ट्रके लिए भी कार्य : नवंबर १९७८ में ‘विकसित देशोंमें आर्थिक सहकार्य’ पर प्रतिवेदन बनाने हेतु संयुक्त राष्ट्रद्वारा गठित समूहके वे सदस्य थे । १९६३ के पूर्वार्धमें डॉ. स्वामीने संयुक्त राष्ट्रके अमेरिकाके मुख्यालयमें ‘सहायक अर्थशास्त्रज्ञ अधिकारी’ पदपर कार्य किया है ।

सोनिया गांधीका प्रधानमंत्री न बनने का सही कारण है - डॉ. स्वामी

२००४ के चुनावमें कांग्रेस पक्ष बहुमतसे चु    नके आनेपर १७ मे २००४ को सायं. ५ बजे सोनिया गांधी सरकार बनाकर स्वयं प्रधानमंत्री बननेवाली थी; परंतु भारतके तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलामने एक कानून बताकर सोनिया गांधीको सरकार बनानेसे रोका । उस कानूनके पिछे थे डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी !

भारतीय नागरी कानूनद्वारा विरोध !

डॉ. स्वामीने १५ मई २००४ में राष्ट्रपतिको एक पत्र भेजा था । उसमें ऐसा कहा था कि कानूनन सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकती । भारतीय नागरी कानून १९५५ के अनुसार यदि भारतका नागरिक उस व्यक्तिके देशमें प्रधान हो सकता है, तो ही उस व्यक्तिको भारतमें प्रधान बनना संभव है । इटलीमें भारतके नागरिकको वहांके कानूनके अनुसार प्रधानमंत्री बनना असंभव है । अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि इटलीमें रहनेवाली सोनिया गांधी कानूनन भारतमें प्रधानमंत्री नहीं बन सकती । 

सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनी तो सर्वोच्च न्यायालयमें आवाहन देनेकी चेतावनी !

१७ मई २०११ को राष्ट्रपति अब्दुल कलामके समक्ष डॉ. स्वामीका पत्र था । राष्ट्रपतिद्वारा दोपहर १२. ४५ को डॉ. स्वामीने कानूनका स्पष्टीकरण मांगने हेतु राष्ट्रपति भवनमें आमंत्रित किया एवं डॉ. स्वामीने यह स्पष्टीकरण दिया । डॉ. स्वामीने राष्ट्रपतिको कहा कि, ‘‘जिसप्रकार मैंने जयललिताको मुख्यमंत्री बननेसे रोका उसी प्रकार सोनिया गांधीके प्रधानमंत्री बननेपर मैं सर्वोच्च न्यायालयमें अभियोग प्रविष्ट कर चुनौती दूंगा ।’’

डॉ. स्वामीकी चेतावनीसे सोनिया गांधी पीछे हटीं !

डॉ. स्वामीकी इस आव्हानात्मक भूमिकासे राष्ट्रपति अब्दुल कलामने सोनिया गांधीको इस विषयमें समझाया कि, ‘यदि आपको कानूनके विरोधमें जाकर सरकार स्थापित करना है एवं प्रधानमंत्री बनना है तो मुझे सर्वोच्च न्यायालयमें डॉ. स्वामीद्वारा प्रविष्ट अभियोगके निर्णयकी प्रतिक्षा करनी होगी । तबतक आपका प्रधानमंत्री बनना असंभव है ।’ इसी कारण अंतमें सोनिया गांधी पीछे हटीं एवं उनका भारतका प्रधानमंत्री बननेका स्वप्न टूटा ।

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