Thursday, September 1, 2011

विवेकानंद आपके आदर्श क्यों है ?

[यह सारे विचार मेरे अपने नहीं है ! किसी के विचारों को मैंने आगे बढाया है ! इसे अन्यथा न लें, टिपण्णी करे! ]
यह संपूर्ण लेख इस लिंक से लिया गया है  - 
(http://answeringyou.blogspot.com/2011/01/blog-post.html )

ज्यादातर हिन्दुओ के लिए विवेकानंद बहुत बड़े आदर्श है | उन्होंने इसवी संवत १८९३ में चिकागो में विश्व धर्मं सम्मेल्लन में हिन्दू धर्मं का प्रतिनिधित्व किया |
पर उनके निजी विचार जान कर उनके रहन-सहन खान पान को जान कर मुझे कही भी नहीं लगा ये संत है या हिन्दू है |
बल्कि इनके अनुयायी रामकृष्ण वालो ने तो स्वंम को हिन्दू ना कहेलाए जाने के लिए कोर्ट में आवेदन भी किया था, पर आश्चर्य तो इस बात का है की हिन्दू उन्हें सर आँखों पर चड़ा कर रखते है बिना जाने के किस कारण से वो इसके अधिकारी है |
मै रामकृष्ण जो की विवेकानंद के गुरु थे और विवेकानंद के बारे में रामकृष्ण की ही पुस्तकों से प्रमाण दे कर उनके विचारो को आपके सामने रखने जा रहा हु |
बहुत से लोग जो भावनात्मक रूप से जुड़े है उनको दुःख होगा पर मेरा निवेदन है की बजाय मुझे बुरा भला कहेने के उन किताबो के पन्ने पलटिये जिनके मै प्रमाण दे रहा हु | रामकृष्ण या विवेकानंदा साहित्य मैंने तो नहीं लिखा मै सिर्फ उन्ही बात को आप तक पंहुचा रहा हु |

आइये जानते है विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण के विचारो के बारे में ........................

१. राष्ट्र के स्वतंत्रता आन्दोलन व सामाजिक सुधारो पर उनके विचार

देश के स्वाधीनता संग्राम में उनका कोई योगदान नहीं है देखिये
"The policy of Ramkrishna mission has always been faithful to (its founder) swami Vivekanand's intention. In the early twenties when India's struggle with England had become intense and bitter, the mission has has harshly criticised for refusing to allow its members to take part in the freedom struggle."
- Teachings of Swami Vivekanand, P.38
उनके जीवनीकार उलट ही लिखते है -
"Ramkrishna & Vivekanand were the first awakeners of India's National Consciousness. They were India's first nationalist leaders in the true sense of the term. The Movement for India's liberation started from Dakshineswar."
-Bio. 231
पर इस बात का खंडन इसी पुस्तक में अंगे स्वं विवेकानंद के शब्दों में देखिये
"Let no political significance ever be attached falsely to my writings. What nonsense! " He said as early as September 1894. A year later he wrote : " I do not believe in Politics. God and truth are the only politics in the world. All else is trash." -बिओ. 232
अब जब स्वयं स्वामी विवेकानंद ही ये लिख रहे है के उनका राजनीती में कोई रुझान नहीं तो वे स्वंतंत्रता आन्दोलन के अग्रदूत कैसे हो सकते है ?

२. रामकृष्ण ने स्वयं को राम और कृष्ण का अवतार घोषित किया


Complete works of Swami Vivekananda (Vol. I, P.66-67)
"Two days before the death of Ramkrishna, Narendra (Vivekanand) was studying by the bedside of the master when a stangre thought flashed into his mind. Was the master (R.K) truly an incarnation of God? He said to himself that he would accept shri R.K.'s divinity if the Master declared himself to be an incarnation. He stood looking intendedly at the master's face. Slowly Shri R.K.'s lips parted and he said in a clear voice - " O my Narendra ! Ae you still not convinced? He who in the past was born as Ram and Krishna is now in his body as R.K.". This R.K. put himself into the category of Ram and Krishna who are recognised by the Hindus as Avtars or incarnations of God."
पौराणिक मान्यता को माने तो भी दसवे अवतार कल्कि है तो अब या तो राम कृष्ण को ही कल्कि मानते होंगे | मुझे तो ये बात कही से हजम नहीं हुई |

३. विवेकानंद के मूर्ति पूजा के सम्बन्ध में विचार

"God is eternal, without any form, omnipresent. To think of him as possessing any form, blasphemy/".
-VII, 411
अब ये मुझे याद दिलाता है हमारे कट्टरपंथी मुस्लिम भाइयो की, ईश्वर निराकार है ये तो समझ में आता है पर एश्निन्दा इस प्रकार है ये तो muslim
कट्टरपन्थियो वाली बात हुई |

वैदिकयुग में प्रतिमापुजन का अस्तित्व नहीं था | उस समाया लोगो की येहे धरना थी की ईश्वर सर्वत्र विराजमान है, किन्तु बुध के प्रचार के कारन हम जगत श्रस्ता तथा अपने सखा स्वरुप ईश्वर को खो बैठे और उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप मूर्तिपूजा की उत्पत्ति हुयी | लोगो ने बुद्ध की मूर्ति बनाकर उसे पूजना आरंभ किया | (देववाणी ७५)
"पहले बौध चैत्य, फिर बौध स्तूप और उससे बुद्ध देव का मंदिर बना | इन बौध मंदिरों से हिन्दू मंदिरों की उत्पत्ति हुई | -विवेकानंद से वार्तालाप ११०
"External worship, material worship", say the scriptures, "is the lowest stage to rise high." -I, 16
और सुनिए क्या कहते है
"Idolatory is the attempt of undeveloped minds to grasp spiritual truths." -Teachings of Swami Vivekananda, P.142
इतने कड़े शब्दों में तो सिर्फ आचार्य चाणक्य ने ही मूर्तिपूजा की निंदा की है "..... उन्होंने कहा है मुर्ख मूर्ति पूजा करते है " पर जब उन्होंने कहा था उस वक़्त मूर्ति पूजा की शुरुआत थी | पर विवेकानंद के समय तक तो बहुत हिन्दू थे जो मूर्ति पूजा करते थे बल्कि हिन्दू धर्मं में मूर्ति पूजा अभिन अंग की तरह ले लिया गया था बिना वेदों का अध्यन किये | और स्वंम विवेकानंद के गुरु मूर्ति पूजक थे उनका क्या करे |

इतना पढने के बाद विवेकानंद के विपरीत विचार देखिये
"यदि मूर्तिपूजा में नाना प्रकार के कुत्सित विचार भी प्रविष्ट तो भी मई उसकी निंदा नहीं करूँगा" -(विवेकानंद चरित, पृष्ठ १४६ )
अरे भाई इतना कहे चुके है क्या वह निंदा नहीं | क्या कहू इनको ......
और विरोधाभाष देखिये
"When miss noble came to India in January 1898 to work for education of India, he gave her the name of Sister Nivedita. At first he taught her to worship Shiva and then made the whole ceremony eliminate in an offering the feet of Buddha." -Vivekanand A Biography by Swami Nikhilanand, P.260
अब बताइए कहा है इनका विवेक | क्या है इनकी मान्यता कौन समझेगा

४. विवेकानंदा का हिन्दू धर्मं से अरुचि और रामकृष्ण का इस्लाम पंथ से प्रभावित होके मुस्लिम होने को हां करना

कलि जी पर बलि देना तो सबको पता है पर स्वयं विवेकानंद कितना समर्थन करते थे इन बलि के नाम पर होने वाली हत्यायो का देखिये |
"One day in the Kali temple of calcutta a western lady shuddered at the sight of blood of Goats, sacrificed before the mighty, and exclaimed - 'why is there so much blood before the Godess?' Quickly the Swami (Vivekanand) replied - why not a little blood to complete the picture?" -Vivekanand A Biography by Swami Nikhilanand, P.261
bade bade samaj sudharko ne devi devtao ko to bali se dur rakha hai bhale hi ve swamm mans bakshan karte ho par vivekanand apvaad the
स्वामी विवेकानंद की फ्रेंच भाषा में प्रकाशित जीवनी के लेखक रोम्य रोल्ला के अनुसार रामकृष्ण एक मुस्लमान से प्रभावित होकर अपना धर्मंपरिवर्तन करने और गोमांस खाने के लिए तैयार हो गए थे | इस प्रसंग में माक्स मुलर ने लिखा है - " For long days he (Ramkrishna) subjected himself to various kinds of discipline to realise the Mohammadon idea of all powerful Allah. He let his beard grow, he fed himself on Muslim diet, he completely repeated the Quran." A Real Mahatman P.३५
कहे सकते है की इसी कारन स्वामी विवेकानंद इस्लाम का गीत गाते रहे है उसका प्रमाण हम आगे देंगे

५. रामकृष्ण मिशन का हिन्दू ना होने के पक्ष में तर्क देना
रामकृष्ण मिशन ने अपने हिन्दू न होने के पक्ष में कल्कुत्ता उच्च न्यायालय में जो तर्क दिए थे उनका अंश अहमदाबाद से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र "टाइमस ऑफ़ इंडिया" के २३ जनवरी १८८६ के अंक से यहाँ उध्रत किया जा रहा है -
" During his practice of Islam he repeated the name of Allah and said Namaz thrice daily. During this while he dressed and ate like Muslim. Another biographical work 'Ramkrishna Panth' by Akshoy Sen, provides some more details. A muslim cook was brought who instructed the Brahman cook how to wear lungi and cook like muslim way. We are also told that at this time Ramkrishna felt a great urge to take beef. However, this urge could not be satisfied openly. But one day as he sat on the bank of Ganges, a carcase of cow was floating by. He entered the body of a dog astrally and tasted the flesh of the cow. His muslim sadhana was not completed.
All this is highly comic but it holds an important position in the mission. The lawyers in the mission did not forget to argue in the court that Ramkrishna was on the verge of eating beef. This was meant to prove that he was indifferent hindu and not far from being a devout muslim." The mission won the case.
ऐसे गुरु को विवेकानंद ईश्वर का अवतार मानते थे यानि अवतार जो मुस्लिम हो जाए | आइये आगे पड़ते है
"Though Thousands of Years the lives of the great prophets of yore came down to us, and yet, none stands so high in brilliance as the the life of Ramkrishna Paramhansa." II, ३१२
"भगवन रामकृष्ण ईश्वर का अवतार थे इसमें मुझे तनिक भी संदेहे नहीं है | भगवान श्री कृष्ण का जन्मा हुआ ही था, यह हम निश्चित रूप से नहीं कहे सकते और बुद्ध चैतन्य - जैसे अवतार पुराने है, पर रामकृष्ण सबकी अपेक्षा आधुनिक और पूर्ण है |" (पत्रावली २, ५६)
ये तो कोम्मुनिस्तो वाली बात हुई कृष्ण को ही नकार दिया | जैसे एक सामान बेचने वाला अपने माल को अच्हा और दुसरो के माल को घटिया कहता है वैसे ही कुछ यह स्वामी विवेकानंद करते दिख रहे है |
"उनकी (रामकृष्ण की) पवित्रता प्रेम और ऐश्वर्या का कण मात्र प्रकाश ही राम, कृष्ण, बुद्ध aadi में था | -पत्रावली भाग १ ,१८७
और सुनिए पर हसियेगा मत
"सत्ययुग का आरंभ रामकृष्ण के अवतार की जन्मतिथि से हुआ |" -पत्रावली भाग १,१८८



6. विवेकानंदा और दोहरा चरित्र

अब तक तो स्वयं आप देख चुके होंगे की विवेकानंद का मस्तिष्क या तो अस्थिर था यह वह जान बुझ कर विरोधाभाषी बात करते थे कारण साफ है मौके का फायदा उठाना और आप को कोई बुरा ना कहेगा | सबकी प्रशंशा करो सत्य को हांड़ी पे चड़ा दो | स्वयं 'Teachings of Vivekanand' के संपादक पुस्तक की भूमिका में लिखते है -
"Vivekanand was the last person to worry about formal consistency. He almost always spoke extempore, fired by the circumstances of the moment, addressing himself to the condition of a particular group of hearers, reacting to the intent of a certain question. That was his nature- he was supremly indifferent if his words of today seems to contradict those of yesterday".
ऐसे व्यक्ति को अवसरवादी कहते है | सत्यवादी ऐसा व्यक्ति कैसे हो सकता है क्यों की या तो कल की बात सही होगी या आज की | क्या एक संत को सत्य वादी न होना चाहिए ?

7. विवेकानंद का खान पान

गोमांस खाने का विरोध करने पर हिन्दुओ को कैसा बेहूदा तर्क देते है स्वामी विवेकानंद जरा देखिये
"To the accusation from some Hindus that the Swami was eating forbidden food, he retorted- if the people of India want me to keep strictly to Hindu diet, please tell them to send me a cook and money enough to keep him"
Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 129
अरे लानत है उन हिन्दुओ पर जो अब भी ऐसे व्यक्ति को आदर्श माने | ये अमेरिकियो के रंग में रंगे नहीं तो और क्या है |
हिन्दुओ का प्रतिबंधित भोजन गोमांस ही होता है इस में किसी को शक नहीं होना चाहिए |

आज के कमुनिस्तो इतिहासकार ब्राहमणों को गोमांस खाने वाला लिखते है कही वो विवेकानंद से ही तो प्रेरित नहीं |
"Orthodox Brahmans regarded with abhorrance the habit of animal food. The swami told them the habit of beef eating by Brahamans in Vedic times".Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 260
दुःख की बात ये है के वही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वाले विवेकानंद को आदर्श बताते है और कमुनिस्तो का विरोध करते है हिन्दू विरोधी बता के जबकि कमुनिस्तो का प्रेरणा श्रोत तो यही दिख रहे है | ऐसे स्वामी ने शाश्त्रों का कितना अध्यन किया होगा इसका अनुमान तो आप स्वयं ही लगा सकते है |
"He advocated animal food for the Hindus, if they were to cope at all with the rest of the world and find a place among the great nation".Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 96
वहा जी वहा दुनिया का मुकाबला करना है तो मांस खाने लग जाये हमारे चक्रवर्ती राजाओ ने दसियों बार विश्व विजय शाकाहारी सेनाओ के साथ की और इनका जन्म हुआ है हमे मांसाहार सिखाने के लिए |
आज भी शक्ति के मापक के तौर पर शाकाहारी घोड़े की शक्ति को ही प्रधानता दी जाती है और " Horse Power" कहा जाता है ना की "Lion Power" .
एक भक्त ने स्वामीजी से पुचा - "मांस तथा मचली खाना क्या उचित और आवश्यक है ?" स्वामी जी ने उतर दिया " खूब खाओ भाई, इससे जो पाप होगा , वहा मेरा होगा .....वैदिक तथा मनु के धर्मं में मचली और मांस खाने का विधान है |..... घास-पात खाकर पेट -रोग से पीड़ित बाबा जी के दल से देश भर गया है.... अतः अब देश के लोगो को मचली , मांस खिला कर उधाम्शील बनाना होगा |" - विवेकानंद के संग में, 267-70
इतने घटिया विचार तो वही व्यक्ति रख सकता है जिसने न वेद का और ना मनुस्मृति का अध्यन किया हो|

८. विवेकानंद के इस्लाम पर विचार


इनका फिर वही दोहरा रवैया | दो मुहि बाते देखिये
"The vast majority of perverts to Islam and Christanity are perverts by the swords or descendents of those." - Teachings of Swami Vivekanand Pg 13
"The Mohammadon religion allows Mohammdons to kill all those who are not of their religion. It is clearly stated in Koran- 'Kill the infidels if they do not accept Islam. They must be put to fire and sword" -Teachings of Swami Vivekanand Pg 180
"The Mohammadon came upon the people of India always killing and slaughtering. Slaughtering and killing they over ran them". Teachings of Swami Vivekanand Pg 151
देखिये उनकी विरोधाभास बाते

"It is the followers of Islam and Islam alone who look upon and behave towards all mankind as their own soul"-
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 254
"Without the help of Islam and the theories of Vedant however fine and wonderful they may be, are entirely valueless."
-A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 255
The spirit of democracy and equality in Islam appealed to Narendra's (Vivekanand's mind and he wanted to create a new India with Vedantic brain and Islamic body."
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 79

स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के बड़े प्रशंसक और इसके भाईचारा के सिद्धांत से अभिभूत थे। वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर को वह भारत की मुक्ति का मार्ग मानते थे। अल्मोड़ा से दिनांक 10 जून 1898 को अपने एक मित्र नैनीताल के मुहम्मद सरफ़राज़ हुसैन को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा कि
‘‘अपने अनुभव से हमने यह जाना है कि व्यावहारिक दैनिक जीवन के स्तर पर यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने समानता के सिद्धांत को प्रशंसनीय मात्र में अपनाया है तो वह केवल इस्लाम है। इस्लाम समस्त मनुष्य जाति को एक समान देखता और बर्ताव करता है। यही अद्वैत है। इसलिए हमारा यह विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, अद्वैत का सिद्धांत चाहे वह कितना ही उत्तम और चमत्कारी हो विशाल मानव-समाज के लए बिल्कुल अर्थहीन है।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 5, पेज 415
स्वामी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि
‘‘भारत में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन तलवार (बल प्रयोग) या धोखाधड़ी या भौतिक साधन देकर नहीं हुआ था।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 8, पेज 330
"मुस्लमान सार्वजानिक भ्रत्भव का शोर मचाते है, kintu vastvik bhraat भाव se kitne dur है | जो मुस्लमान नहीं है वो उनके भ्रत्संघ में शामिल नहीं हो सकते है | उनके गले कटे जाने की ही अधिक सम्भावना है | -धर्मराहस्य, प्रष्ट 43
"For our own motherland a junction of two great religious systems- Hinduism and Islam - is the only hope."
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 218
also on
-Teachings of Swami Vivekanand Pg 255
निर्णय आपके हाथ में है

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