Wednesday, February 25, 2015

मदर टेरेसा : कर्म से नहीं बल्कि वेटिकन पोषित मीडिया द्वारा घोषित संत


माननीय भागवत जी ने क्या गलत कह दिया ये कह कर की मदर टेरेसा सेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन कराया करती थी, अरे ये तो जग जाहिर है ! इतने हो हल्ला का कारण सिर्फ ये है की ये खुलासा किसी साम्प्रदायिक व्यक्ति ने किया है !  जबकि यूरोप की मीडिया पहले से ये खुलासा करती आई है !

कनाडा की मोंट्रियाल यूनिवर्सिटी के सर्ज लैरिवी, जेनेवीव चेनार्ड तथा ओटावा यूनिवर्सिटी के काइरोल सेनेचाल इन शोधोकर्ताओं ने मदर टेरेसा पर किए गए शोध के द्वारा ईसाई सेवाभाव के खोखलेपन को उजागर किया है । इनकी  रिपोर्ट को विश्वभर के समाचार-पत्रों में छापा गया है ! जिसमे कहा गया है की मदर टेरेसा संत नहीं थी । शोध–टीम का नेतृत्व कर रहे प्रो॰ लेरिवी ने कहा : नैतिकता पर होनेवाली एक विचारगोष्ठि के लिए परोपकारिता के उदाहरणों की खोज करते हुए हमारी नजर कैथोलिक चर्च की उस महिला के जीवन व क्रियाकलापो पर पड़ी, जो मदर टेरेसा के नाम से जानी जाती हैं और जिसका वास्तविक नाम एग्नेस गोंज्क्झा था। हमारी उत्सुकता वढ़ गयी तथा हम और अधिक अनुसंधान करने के लिए प्रेरित हुये ।

मदर टेरेसा की छवि असरदार मीडिया-प्रचार के कारण थी, न कि किसी अन्य कारण से । वेटिकन चर्च ने मदर टेरेसा को जो संत घोषित किया जिससे वह खाली होते हुए चर्चों की ओर लोगों को आकर्षित कर सके । वेटिकन पोषित मीडिया ने रोगियों की सेवा के उनके संदेहास्पद ढंग, रोगियों की पीड़ा कम करने के स्थान पर उस पर गौरव अनुभव करने की विचित्र प्रवृत्ति, उनके संदिग्ध प्रकार के राजनेताओं से संबंध और उनके द्वारा एकत्रित प्रचुर धनराशि के संशयास्पद उपयोग – इन सभी तथ्यों को हमेशा नजरअंदाज किया ।

किसी को संत घोषित करने के लिए एक चमत्कार का होना आवश्यक माना जाता हैं । मदर टेरेसा के चमत्कार का पर्दाफाश करते हुए साइंस एंड रेशनलिस्ट एसोसिएशन आंफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी श्री प्रबीर घोष ने कहा कि एक आदिवासी महिला मोनिका बेसरा को पेट में टीबी का ट्यूमर था और उसने मदर की प्रार्थना की और मदर का फोटो पेट पर रखा, जिससे वह स्वस्थ हो गयी यह बात बकवास है । उस महिला के चिकित्सक डांक्टर तरुण कुमार विश्वास और डांक्टर रंजन मुस्ताफी ने कहा कि उसने 9 महीने तक टीबी का उपचार किया था, जिससे वह महिला स्वस्थ हुई थी ।
मदर टेरेसा पीड़ितो के लिए प्रार्थना करने में उदार किन्तु उनके नाम पर एकत्रित अरबों रुपयों को खर्च करने में कंजूस थी । अनेक बार आयी बाढ़ जैसी आपदाओं तथा भोपाल गैस त्रासदी के समय उन्होने प्रार्थनाएँ तो बहुत की लेकिन अपनी फाउंडेशन से कोई आर्थिक सहायता प्रदान नहीं की । उनके द्वारा चलाये जा रहे अस्पतालो की हालत दयनीय पायी गयी ।

मदर टेरेसा के 100 से अधिक देशो में 517 मिशन यानी मरणासन्न व्यक्तियों के घर (Homes for the dying) थे । गरीब रोंगी इन मिशनों में आते थे । कोलकाता में इन मिशनो की जांच करनेवाले डांक्टरों ने पाया कि उन रोगियों में से दो-तिहाई की ही डांक्टरी इलाज मिलने की आशा पूर्ण हो पाती थी, शेष एक – तिहाई के अभाव में मृत्यु का ही इंतजार करते थे । डांक्टरों ने पाया कि इन मिशनों में सफाई का अभाव, यहाँ तक कि गंदगी थी, सेवा – शुश्रूषा, भोजन तथा दर्दनाशक दवाइयों का अभाव था । पूर्व में भी चिकित्सा – जगत के सुप्रतिष्ठित जर्नलों (पत्रिकाओं) – ब्रिटिश मेडिकल जर्नल व लैन्सेट ने इन मरणासन्न व्यक्तियों के घरो की दुर्दशा को उजागर किया था । लैन्सेट ने संपादकीय में यहाँ तक कहा कि ठीक हो सकनेवाले रोगियों को भी लाइलाज रोगियों के साथ रखा जाता था और वे संक्रमण तथा इलाज न होने से मर जाते थे ।

इन सबके लिए धन का अभाव जैसा कोई कारण नहीं था । प्रो॰ लेरिवी कहते है कि अरवों रुपये मिशनरिज आंफ चैरिटी के अनेकों बैंक खातो में जमा किए जाते थे किन्तु अधिकांश खाते गुप्त रखे जाते थे, सवाल उठाता है कि गरीबों के लिए इकट्ठा किये गये करोड़ो डालरों जाते कहाँ हैं ? पत्रकार क्रिस्टोफर हिचेस के अनुसार धन था उपयोग मिशनरी गतिविधियों के लिए होता था

शोधकर्ताओं के अनुसार धन कहीं से भी आये, टेरेसा उसका स्वागत करती थी ।  हैती (Haiti) देश की भ्रष्ट व तानशाह सरकार से प्रशस्ति-पत्र तथा धन प्राप्त करने में उन्हे कोई संकोच नहीं हुआ । मदर टेरेसा ने चार्ल्स कीटिंग नमक व्यक्ति से, जो कि कीटिंग फाइव स्कैंडल नाम से जानी जानेवाली धोखाधड़ी में लिप्त था, जिसमे गरीब लोगों लो लूटा गया था, 12.50 लाख डालर (6.75 करोड़ रू.) लिए और उसके गिरफ्तार होने से पूर्व तथा उसके बाद उसको समर्थन दिया ।
क्रौस पर चढ़े जीसस की तरह बीमार भी सहे पीड़ा ............मदर टेरेसा

जो लोग मदर टेरेसा को निर्धनों का मसीहा, गरीबों की मददगार, दया-करुणा की प्रतिमूर्ति कहते हैं, वे मदर टेरेसा का असली चेहरा देखकर तो सहम ही जाएंगे – शोधकर्ताओं के अनुसार मदर टेरेसा को गरीब – पीड़ितों को तड़तपे देखकर सुखद अनुभूति होती थी । क्रिस्टोफर हिचेंस की आलोचना का प्रत्युत्तर में मदर टेरेसा ने कहा था : निर्धन लोगों द्वारा अपने दुर्भाग्य को स्वीकार कर ईसा मसीह के समान पीड़ा सहन करने में एक सुंदरता है। इनके पीड़ा सहन करने से विश्व को लाभ होता है । है न वे सिर पैर की बात ! हिचेंस बताते हैं कि एक इंटरव्यू में मंद मुस्कान के साथ मदर टेरेसा कैमरे के सामने कहती हैं कि मैंने उस रोगी से कहा :  तुम क्रौस पर चढ़े जीसस की तरह पीड़ा सह रही हो, इसलिए जीसस जरूर तुम्हें चुंबन कर रहे होंगे ।टेरेसा की इस मानसिकता का प्रत्यक्ष परिणाम दर्शानेवाला तथ्य पेश करते हुए रेशनेलिस्ट इन्टरनेशनल के अध्यक्ष सनल एडामारुकु लिखते है : वहाँ रोगियों को दवा के अभावमें खुले घावों में रेंगते कीड़ों से होनेवाली पीड़ा से चीखते हुए सुना जा सकता था ।
शोधकर्ताओं के अनुसार जब खुद मदर टेरेसा के इलाज की बारी आयी तो टेरेसा ने अपना इलाज आधुनिकतम अमेरिकी अस्पताल में करवाया ।

यहाँ पर ये भी ध्यान करने योग्य है की मदर टेरेसा की प्राथना व हाथ रखने से लोग वाकई ठीक होते हैं तो उन्होंने अपना इलाज अमेरिका के आधुनिक अस्पताल में क्यूँ कराया ! दूसरा ये की यदि मदर टेरेसा वाकई कोई जादुई संत थी तो उन्होंने जॉन पॉल को क्यूँ ठीक नहीं किया जो पारकिसन्स डिससिस से पीडित था 20 साल से !

इस प्रकार ईसाई मिशनरियों के सेवाभाव के खोखलेपन के साथ उनके वैचारिक दोमुंहेपन एवं विकृत अंधश्रद्धा को भी शोधकर्ताओं ने दुनिया के सामने रख दिया है ।

ईसाई धर्म में जीवित अवस्था में किसी को संत नहीं माना जाता । प्रारम्भ में तो अन्य धर्म के साथ युद्ध में जो शहीद हो गये थे, उनको ईसाई लोंग संत मानते थे । बाद में अन्य विशिष्ट मिशनरियों एवं अन्य कार्यकर्ताओं का पोप के द्वारा उनके देहांत के बाद उनके ईश्वरीय प्रेम की प्राप्ति का दावा किसी बिशपके द्वारा करने पर और उस पर विवाद करने के बाद कम–से–कम एक चमत्कार के आधार पर संत धोषित करने की प्रथा चल पड़ी । इसलिए ईसाई संतो को कोई आध्यात्मिक महापुरुष नहीं मान सकते । जिनको ईश्वर प्राप्त नहीं हुआ है ऐसे पोप के द्वारा जिसे संत घोषित किया जाता हो वह महापुरुष नहीं हो सकता । इस प्रकार सनातन धर्म के संतो में और ईसाई संतो में बड़ा अंतर है । फिर भी भारत के मीडिया द्वारा विधर्मी पाखंडियों को आदरणीय संत के रूप में प्रचारित करने और लोक-कल्याण में रत भारत के महान संतो को आपराधिक प्रवृत्तियों में संलग्न बताकर बदनाम करने का एकमात्र कारण यह है कि अधिकांश भारतीय मीडिया ईसाई मिशनरियों के हाथ में है और वे लाखो-करोड़ो डालरों लुटाकर भी हिन्दू धर्म को बदनाम करते है


(संदर्भ : DNA, Times of india, www.wsfa.com , राजीव दिक्सित जी, etc)

Tuesday, February 19, 2013

क्या ‘कृश्चियनिटी ही कृष्ण-नीति है’ डॉ० पी०एन० ओक

क्या वाकई कोई जीसस थे ?   “क्या हास्यास्पद कथन है, ऐसी बात हमने कभी सुनी ही नहीं।” 

यदि किसी नए सिद्धान्त को पूर्णतया समझना हो तो उसे अपने मस्तिष्क को समस्त अवधारनाओं, अवरोधों, शंकाओं, पक्षपातों, पूर्व धारणाओं, अनुमानों एवं संभावनाओं से मुक्त करना होगा।
 
इसके शीर्षक कृश्चियनिटी ही कृष्ण-नीति है से पाठकों में मिश्रित प्रीतिक्रिया उत्पन्न होने की संभावना है। उनमें से अधिकांश संभवतया छलित एवं भ्रमित अनुभव करते हुए आश्चर्य करेंगे की कृष्ण-नीति क्या हो सकती है और यह किस प्रकार कृश्चियनिटी की और अग्रसर हुई होगी।

क्राइस्ट कोई ऐतिहासिक व्यक्ति था ही नहीं, अतः कृश्चियनिटी वास्तव में प्राचीन हिन्दू, संस्कृत शब्द कृष्ण-नीति का प्रचलित विभेद है, अर्थात वह जीवन-दर्शन जिसे भगवान कृष्ण, जिसे अँग्रेजी में विभिन्न प्रकार से लिखा जाता है, ने अवतार धरण कर प्रचलित, प्रीतिपादित अथवा आचरित किया था। कृष्ण, जिसको क्राइस्ट उच्चरित किया जाता है, यह कोई यूरोपीय विलक्षणता नहीं है। यह भारत में आरंभ हुआ। उदाहरण के लिए  -  भारत के बांग प्रदेश में जिन व्यक्तियों का कृष्ण रखा जाता है उन्हें क्राइस्ट संबोधित किया जाता है। 

जीसस क्राइस्ट कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं हैं, क्योंकि कम से कम विगत दो सौ वर्षों से असंख्य जन यह संदेह करते रहें हैं कि क्राइस्ट की कथा औपन्यासिक है। नेपोलियन जैसे अनेक प्रमुख व्यक्ति समय समय पर स्पष्ट रूप से इस संदेह को उजागर करते रहे हैं। हाल ही में अनेक यूरोपियन भाषाओं में भी यूरोपियन विद्वानों द्वारा अपने परिपूर्ण शोध-प्रबन्धों में कृष्ण-कथा की असत्यता को प्रकाशित किया है। 

इस लेख में आप जानेगे कि– 1- क्राइस्ट-कथा का मूल कृष्ण है, 2- यह की बाइबल धार्मिक ग्रंथ से सर्वथा प्रथक एक कृष्ण-मत से भटके प्रकीर्ण, संहतिक्रत लाक्षणिक लेखा-जोखा है, 3- यह कि जीसस कि यह औपन्यासिक गाथा सैंट पॉल के जीवन के उपरांत ही प्रख्यात की गई, 4- यह की नए दिन का प्रारम्भ मध्यरात्रि के बाद मनाने की यूरोपिय परंपरा उनमें कृष्ण-पूजा के आधिक्य के कारण प्रचलित हुई। 

हिन्दू परंपरा में कृष्ण का जन्म दैत्यों के अत्याचार एवं अनाचार के अंधकारमय दिनो का स्मरण करता है। कृष्ण का जन्म शांति, संपन्नता और सुखमयता के नवयुग के नवप्रभात का अग्रदूत है। मध्यरात्रि से दिन के आरंभ की यूरोपियन पद्धति वास्तव में हिन्दू भावना का ही प्रस्तुतीकरण है जो अपनी ही प्रकार से यह सिद्ध करती है कि यूरोप हिन्दू-अंचल था। 

यूरोपियन विद्वानो की यह खोज कि जीसस क्राइस्ट कोई काल्पनिक चरित्र हैं, केवल अर्धसत्य है जो कि और अधिक भ्रम उत्पन्न करता है क्योंकि यह बताने में यह खोज असफल रही कि जीसस क्राइस्ट कथा क्यों और कैसे आरंभ हुई। सर्वाधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि जीसस क्राइस्ट जैसा कोई चरित्र था ही नहीं तो फिर क्रिश्चयनिटी के विषय में यह सब संभ्रम क्यों फैला ? डॉ० पी०एन० ओक की पुस्तक कृश्चियनिटी ही  कृष्ण-नीति है उसी अंतिम सूत्र को निर्दिष्ट करती हुई बताती है कि क्रिश्चयनिटी और कुछ नहीं अपितु हिंदुओं के कृष्ण मत का यूरोपियन तथा पश्चिम एशियाई विकृती है। 

अत: बाइबल भी धर्मग्रंथ किंचित भी नहीं अपितु जेरूशलम और कौरिन्थ स्थित कृष्ण मंदिरों के संचालकों के परस्पर मतभेद का कुछ संहतीकृत और कुछ लाक्षणिक कथामात्र एंव उसका परवर्ती संस्करण है। अलग हुए भाग ने कृष्ण मंदिर कि व्यवस्थता को हथियाने के सीमित से निमित्त के लिए एक विद्रोहात्मक आंदोलन आरंभ कर दिया। सौल अथवा पौल इसका नेता था। यह पौल ही है जिसका वृत्त-चित्रण बाइबल में किया गया है। बारह देवदूत यहूदी समुदाय के वे बारह वर्ग हैं जिनकी सहायता की पॉल ने इच्छा की थी। इसलिए जीसस के छदमवेश में पौल ही बाइबल का मुख्य पात्र है। 

यथातथा उनकी बड़ी-बड़ी अपेक्षाओं से कहीं परे पौल, पैटर, स्टीफन आदि द्वारा संचालित आंदोलन एक प्रवाह में परिवर्तित होकर असहाय आंदोलनकर्ताओं को कृष्ण-मत से दूर ले जाता हुआ और उनको किसी अज्ञात तट पर, जिसे वे अब भी भयाक्रांत से कृष्ण नीति ही मानते रहे, जो अब क्रिश्चयनिटी कही जाती है। बाइबल उस संघर्ष का लाक्षणिक लेखा-जोखा है जिसे आंदोलनकर्ताओं ने साहस जुटाकर प्रपट किया, जो अब यहूदी नागरिकों तथा रोमन अधिकारियों को खतरा बन गया है। यहूदियों को यह भय था कि यदि ये सब क्रिश्चयन बन गए तो यह संस्कृति खत्म हो जाएगी। दूसरी ओर रोमन अधिकारियों को यह भय होने लगा कि कृष्ण मंदिर विवाद इस परिमाण में बड़ गया है कि वह स्वयं प्रांतीय प्रशासन के विरुद्ध खुले विढ्रोह के रूप में भयाभय सिद्ध हो रहा है।
उनका भय निरधार नहीं था, जैसा कि कालांतर में इसने जुड़ाइज्म को अंधकार में विलीन कर क्रिश्चिनीति को स्थापित किया और रोम की क्रिश्चिन-पूर्व की संस्कृति को तहस-नहस कर भूमिसात् कर दिया । 

चार शताब्दों की इस अराजकता की अवधि में विद्रोहियों ने, जैसा कि यहूदियों ने रोमन अधिकारियों को सूचित किया, समय-समय पर उन्हे उनके अपराधो के लिए दंडित किया । यहूदी रोमन अधिकारियों को सूचित करते थे, क्योंकि वे जीसस के मिथक को उन्मत्तता और हिंसा द्वारा फैलाकर उनकी शांति को भंग कर रहे थे । इस दिशा में रोमन अधिकारी उनके विरुद्ध कार्य करके उन नए दंगो को रोककर अथवा शांत कर उन्हें उपकृत कर रहे थे । यह आंदोलन स्पष्टतया, झड़पो, मुठभेड़ों, हत्याओ, सामूहिक अवरोधो, निष्कासनों, कर न देना जैसा कि मंदिर के भीतर धन-विनिमय कारों के खातो से विदित होता था, बड़े जोरों से फैल गया । और तब यह प्रश्न उत्पन्न हो गया कि जो कर देय है क्या उसे सीजर के पास जमा कर दिया जाय ? उस विद्रोह को समाप्त करने के प्रयास में विद्रोहियों को इतने पत्थर मारे गए अथबा उन्हे फांसी पर लटका दिया गया। यही वह संघर्ष हैं जो बाइबल में अंकित और वर्णित है । यही कारण है कि पोल तथा अन्य लोग, जो उस आंदोलन मे सीधे वा किसी अन्य प्रकार से सम्मिलित थे, बाइबल में उनका पत्र-व्यवहार भी समाहित हैं। काल्पनिक जीसस का अभिव्यक्तिकरण विद्रोहियों में समान्यतया और पोल मे विशेषतया किया गया हैं । कांटो का मुकुट और जनसमुह की अवज्ञा, अवमानना, परिश्रम और अंत मे फाँसी पर लटकाना यही आंदोलनकर्ताओं कि कथा का सार है। जीसस का अवतार मुख्य रूप से उन यहूदियों के अनुरूप ही बैठता है जो अंदोलनकर्ताओं के विषय में रोमन प्रशासन को सूचित करते रहे हैं जबकि पुनर्जीवित होना विद्रोहियों के शक्तिशाली गुट के रूप में होने का प्रतीक है। बाइबल का संहतीकृत और संघर्ष के लक्षणिक इतिहास के रूप में अध्ययन किया जाय तो तभी उसमें कुछ सार दिखाई देता है। 

क्योंकि बाइबल की ऐसी वास्तविकता अज्ञात और अविदित रहती रही थी इसलिए विद्वान और बाइबल के विद्वान इसके वर्णन और धर्म से अनुकूलता के संगतीकरण मे कोई संयोग पाने में अब तक बड़ी कठिनाई का अनुभव करते रहे थे। उनके लिए बाइबल अब तक एक बेमल तथा परस्पर विरोधी अनियमितता एवं आपाधापी में गूँथे गए तत्वों का पिंड सा है। अब तक बाइबल का प्रत्येक पाठक यही आश्चर्य करता रहा कि वास्तव में बाइबल का अभिप्राय क्या अभिव्यक्त करना है? यह ऐसी दिखाई देती थी मानो इसके बेमेल संकलन में बाइबल धर्म चर्चा और वर्णन, जीवनवृत और प्रार्थना, विनती और प्रवचन और क्रोध और परित्याग, ये एसबी परस्पर अस्त-व्यस्तता से मिश्रित हैं। इस रहस्य को अब हमने सर्वप्रथम उदद्घाटित किया है। विभ्रम, कतरना, असंगतता, गुप्तता तथा रूपकरता संघर्ष के प्रकार और इसके अनपेक्षित, निरुउद्देश्य और अवांछितता के कारण उत्पन्न हुए है। जिस प्रकार ब्रिटीशर्स ने मसालों का व्यापार करते-करते ही भारत को अपने अधीन कर लिया, ठीक उसी प्रकार जिन्होंने किंही एक-दो कृष्ण मंदिरों का अधिकार पा लिया उन्होने बड़े  आश्चर्य एंव संभ्रम व लज्जा से पाया कि उनका प्रबल घोष सम्पूर्ण समसामयिक सांप्रदायिक ढांचा उनके सिरों पर ही टूट रहा है। इसलिए परिस्थितीओं से विवश होकर उनको अपने संघर्ष का संहतीकृत, भ्रामक, अस्तव्यस्त, आलेख ही अपना धर्मग्रंथ स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार मानवता का भौत बड़ा भाग अनंत: चाटुकारितापूर्ण, अविश्वसनीय पाठ्य सामाग्री को मुक्ति एंव धर्म स्वीकार करना जनसामान्य की बुद्धिविहीनता का प्रतिबिंब है। जनसामान्यका यह स्वभाव होता है भीड़ का अनुसरण करना, यह जाने बिना कि इसका गंतव्य और उद्देश्य क्या है। बाइबल की वास्तविकता को मेरी खोज से न केवल क्राइष्ट्रोलॉजी के अध्ययन एवं बाइबल और तत्संबंधी धर्म में ही अत्यधिक गड़बड़ उत्पन्न करेगी अपितु समसामयिक संसार के सम्पूर्ण धार्मिक प्रकार को गड़बड़ा देगी ।
कथमपि यह मुझ पर आ पड़ा है कि संसार की अनेक मुख्य ऐतिहासिक एवं धार्मिक अवधारणओ का मैं पर्दाफास करूँ । पंद्रह वर्ष पूर्व मैंने अपनी अदभूत खोज की घोषणा की थी कि भारत अथवा अन्य किसी भी देश का कोई भी ऐतिहासिक भवन; यथा – लालकिला और ताजमहल, समरकन्द का तामरलेन का तथाकथित मकबरा, किसी भी विदेशी आक्रमणकर्ता का, जैसा कि समान्यतया उसे उसके नाम से बताया जाता है, उसका नहीं है । 

जैसा कि समान्यतया उसे उसके नाम से बताया जाता है, उसका नहीं है । प्रत्येक तथाकथित ऐतिहासिक मस्जिद या मकबरा, भारत में हो अथवा विदेश में, वह अधिग्रहित हिन्दू सौंध ही है । परिणामतः इण्डो-अरब-शिल्प-कला का सिद्धान्त बहुत बड़ा मिथक हैं । इसके परिणामस्वरूप समस्त संसार में विध्यमान ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं शिल्प-विध्या संबंधी अध्ययन मे निहित मूल त्रुटियाँ उजागर नहीं हो पाई । इसीलिए आज संसार-भर के विद्वान बड़े जोर-शोर से काल्पनिक इस्लामी भवनो के संबंध में अपने पूर्व-कृत्यों का पुनराबलोकन कर रहे हैं ।
जीसस और बाइबल के संबंध में मेरी खोज, जो की उसी प्रकार दूरगामी और विचलित करने वाली 
 , कुरान के भी आलोचनात्मक अध्ययन के लिए विवश करेगी । क्योंकि उसके विषय में भी यह कहना कि वह आसमान से नाजल हुआ था, जीसस को सर्वथा ऐतिहासिक पुरुष और बाइबल को धार्मिक ग्रंथ मानने के समान ही है । क्योंकि कुरान में जीसस तथा कुछ और आगे बड़कर बाइबल ककी भांति प्रकाश दिखाने की भविष्यवाणी की गई हैं, वह एक प्रकार से विश्रामक दौड़-सी हैं । किन्तु क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका कि कोई ईसा नहीं है तो फिर कुरान कहाँ रह सकती है ?  यदि कुरान के विषय में मान लिया जाय कि स्वर्ग में स्थित फलक का प्रतिलेख हैं जो अरेबिया मे प्रसारित किया गया है तो बताइए त्रुटि कहाँ हैं ? क्या स्वर्ग का लेखा त्रुटिपूर्ण है अथवा उसके अरब मे उतरने पर उसमें गड़बड़ी की गई हैं ? विद्वान और जनसमान्य समान रुप से इसे जानने को उत्सुक होंगे । क्राइस्ट ने ध्वन्यात्मक रूप में संत्रास किया । जब उसको उस प्रकार से उच्चारण करे तो हम उसे हिन्दू, संस्कृत शब्द कृष्ण से मिलता-जुलता पाएंगे ।नीति प्रत्यय भी संस्कृत का है । इसलिए क्रिश्चिनीति शब्द वास्तव में कृष्ण-नीति को अभिव्यक्त करता है अर्थात भगवान कृष्ण द्वारा प्रतिपादित अथवा आचरित जीवन-दर्शन । अंग्रेजी में क्राइस्ट को अनेक प्रकार से लिखा जाता है जैसे कि देवनागरी में कृष्ण को। परंतु क्योंकि अंग्रेजी में क्रिश्चिनीति एक ही मानक रूप में समस्त विश्व में लिखी जाती है, हमने इस पुस्तक में कृष्ण और कृष्ण-नीति पर समकक्ष लेखन पर स्थित रहकर इस बात पर बल दिया है कि उसके अन्य प्रकार केवल ध्वनात्मक विभेद हैं। 

रोमन वर्णमाला की अपूर्णता तथा विभिन्न भाषाओं द्वारा इसके ग्रहण ने लेखन में अत्यधिक विभ्रम उत्पन्न कर दिया हैं, संस्कृत शब्द ईश अलियास ईशु अंग्रेजी ग्रीक तथा लैटिन भाषा में विभिन्न प्रकार से किहा जाता है। ईशायुस, इयासियुस, इसेयुस, इसेयुस , ईसुस और जेसुस – ये कुछ इसके अनेक नामों में से है। इसी प्रकार सिलास, सिलुस और सिल्वानुस, स्टेफेन तथा स्टीफन आड़ ध्वनि-विभेद त्रुटिपूर्ण रोमन लिपि के कुछ लक्षण हैं: यदि इसलिए पाठक इस पुस्तक में कोई एक नाम विभिन्न स्थानो पर अनेक प्रकार से लिखा गया हैं तो निराशा में लेखक स्वयं सहभागी हैं ।
एक बार फिर अपने खोजपूर्ण कार्य की ओर आते हुए मै कहना चाहता हूँ कि सर्वथा अप्रत्याशित, किंचित् नहीं, अत्यंत ही महत्वपूर्ण, अत्यंत भयावह और निराशाजनक परिणाम इस खोजपूर्ण कृति के होंगे, खोज जो पश्चात्य विद्वानो जिन्होने शैक्षिक क्षेत्रो में दो शताब्दो तक राज्य किया हैं, उन्होने भाषा-विज्ञान संबंधी भयंकर भूल की है जो कि उनके शब्दकोशों एवं विश्वकोशों तथा अन्य लेखों को नष्ट कर देगा । इसको प्रदर्शित करने के लिए इस पुस्तक के प्रष्ठ ११७ पर हमारे द्वारा उद्ध्र्त उद्दरण का उल्लेख करेंगे । 

वहाँ ग्रीक शब्द हिरोसोलिमा को इस प्रकार कहा गया है जिसका अभिप्राय होता है होली सलम अर्थात होली जेरूसलम । यह भयंकर भूल हैं ।
हिरोसोलीमा संस्कृत शब्द हरि-ईश-आलयम् का भ्रष्ट ग्रीक रूप है जिसका अभिप्राय है भगवान हरि अथवा भगवान कृष्ण का आसान, स्थान अथवा नगर । नगर के पवित्र होने की भावना केवल इसके भगवान हरि के निवास होने के कारण अनुमानित है ।
इसी प्रकार जब एनसाइक्लोपीडिया जुडेशिय हिबू का मूल ही दिव्य संज्ञा का संक्षिप्त रुप, बताता है तो वह यह बताने मे असमर्थ रहता है कि वह दिव्य संज्ञा क्या थी । वह दिव्य संज्ञा है हरि अलियास कृष्ण । इसलिए यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यहाँ तक कि उनके अपने विशिष्ट क्षेत्र में भी पश्चात्य विद्वान वास्तविकता से कितनी दूर निकल गए है, अपने अर्धपक्व और भली प्रकार न समझी गई खोजो मे लगे रहने की अपेक्षा पाश्चात्य विद्वान सदा-सदा के लिए यह स्वीकार कर ले कि संस्कृत भाषा और हिन्दू परम्पराएँ मुख्य विश्व संस्कृत के रूप में मानव-सभ्यता की जड़ मे समाहित है, तो उपयुक्त होगा ।   

Wednesday, January 30, 2013

तमाम विरासत को अपने में संजोये उत्तर प्रदेश के तराई का एक छोटा सा जिला "पीलीभीत" जनपद

जनपद पीलीभीत उत्तरी पूर्व भाग के तराई भाग के तराई क्षेत्र मे लगभग 28.30 उत्तरी अक्षांश एवं पूर्वी देशांतर से 28.37 पूर्वी देशांतर तक फैला हुआ है उत्तर मे जिला उधमसिंह नगर एवं नेपाल राज्य, दक्षिण मे जिला शांहजहाँपुर पूरब मे जिला खीरी पश्चिम मे जिला बरेली है पीलीभीत जनपद का क्षेत्रफल 3765.7 वर्ग किमी है इस प्रमुख नदी शारदा, गोमती, देवहा, खकरा कैलाश है
पीलीभीत के नाम की उत्पत्ति मे भी अनिश्चितता है लेकिन खकरा नदी के उत्तर पूर्व न्यूरिया मार्ग पर खकरा नदी के किनारे पुराना पीलीभीत गाँव अब भी है यह गाँव हमेशा से ही पेरिया कुल के बंजारो के अधिपत्य मे रहा इसी कारण इसे पेरियाभीत माना जाता है कुछ लोग इसे पीली दीवार का नगर मानते हुए इसे पीलीभीत कहते है
सम्वत् 1659 विक्रमी मे हुक्मचंद्र लवानियां ने यहाँ के मुण्डिया ग्राम का विस्तार जो इलाका आबाद किया वह पीलीभीत कहलाया
हाफ़िज़ रहमत खाँ ही पीलीभीत के वास्तविक निर्माता है इन्होने कई वर्षो तक इसे अपनी राजधानी बनाया पीलीभीत का नाम हाफिजबाद रखा गया हाफ़िज़ रहमत खाँ के बाद यह क्षेत्र अवध के नवाब के अधीन हो गया सन् 1800 मे रूहेलखण्ड के क्षेत्र को अंग्रेज़ो को दे दिया नवम्बर 1879 तक पीलीभीत जिला बरेली का उपखण्ड था, जिसकी तहसील जहानाबाद थी मशहूर शायर शरुर जहानाबादी यही पैदा हुए हिन्दुओ ने कस्बे के पास ही महादेव का मंदिर बनवाया दक्षिण मे मनुकामना  नाम का प्राचीन स्थान है किवदंती के अनुसार आल्हा ऊदल यही आकर रुके थे
जहानाबाद नगर से कुछ दूरी पर विलई खेङा अपने मे प्राचीन सभ्यता का इतिहास संजोए हुए है चक्रवर्ती सम्राट राज वेन के किले के अवशेष एक टीले के रूप मे है जहाँ से टूटी फूटी मूर्तियाँ, वर्तन धातु के सिक्के मिल रहे है
पीलीभीत जनपद मे विभिन्न ऐतिहासिक
इमारते ऐतिहासिक स्थल
राजा बालि का महल का टीला - राजा बालि के गवा ध्वज परसुआ ग्वाल की अटारी या महल का टीला 1400 फीट लम्बा 300 फीट चौङा और 35 फीट ऊँचा है यहाँ राजा बालि द्वारा बनवाया हुआ प्रासिद्ध चक्र सरोवर है यहाँ भगवान के सुदर्शन चक्र ने जल मे समाधि ली थी

राधा रमण का मन्दिरवर्ष 1896 मे इस मन्दिर का निर्माण हुआ यह मन्दिर वृंदावन के शैली मे ही पत्थर से बना है मन्दिर मे राधाकृष्ण की मूर्ति विराजमान है       
 
मैनाकोट पूरनपुर मे ही कलीनगर के पास ऐतिहासिक मैना कोट मे रानी मैनरा की गढ़ी है जंगल मे रानी का किला है और काँच का एक कुँआ था किवदंती के अनुसार चने के पौधे मे रानी का विछुआँ उलझ गया था इस कारण रानी ने श्राप दे दिया जिससे इस क्षेत्र मे चना नही होता है रानी मैनरा द्वारा 56000 हजार गायों को पानी पीने के लिए एक सागर ताल बनाया गया सागर ताल खस्ता हाल मे है रानी इसी ताल के पास सती हुई थी

राजा वेणु का किला पूरनपुर मे शाहगढ़ स्टेशन से लगभग 1 किमी दूर एक टीला है जहाँ कभी राजा वेणु का महल था राजा वेणु से लक्ष्मी के रूठने, खूंटी द्वारा हार निगल जाने तथा सात कन्याओ के इधर उधर हो जाने की कहानियाँ जन मानस मे प्रचलित है शाहगढ़ टीला सात देवियो की जन्म भूमि के रूप मे प्रासिद्ध है
इलाबॉसपीलीभीत की बीसलपुर तहसील मे इलाबॉस गाँव मे देवी जी का प्राचीन मंदिर है यह मंदिर 12वी शताब्दी का निर्मित है  
   
मोरध्वज का किला पीलीभीत जनपद की बीसलपुर तहसील स्थित बिलसण्डा करवा के निकट मरौरी ग्राम के पुराने महल भग्नाविशेष है जन श्रुति के अनुसार यहाँ राजा मोरध्वज का किला बताया जाता है इस तिले के पास अष्टकोण का तालाब भी है
 
बाबा दुर्गानाथ का मन्दिर माधोटांडा के पास बाबा दुर्गानाथ की समाधि पर स्थित मन्दिर दुर्गानाथ का मन्दिर कहलाता है यहाँ एक सिद्ध योगी दुर्गानाथ रहते थे उनको गंगा म्य्या द्वारा प्रतिदिन गंगा स्नान करने का वरदान प्राप्त था उसके बाद उनकी कुटिया के निकट गंगा की प्रवाह मान धारा प्रकट हुई जिससे वह प्रतिदिन स्नान करने लगे आज यह स्थल गोमती उद्गम स्थल माना जाता है
 
शाही जामा मस्जिदपीलीभीत मे दिल्ली की शाही जामा मस्जिद की तर्ज पर रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत खाँ ने इस मस्जिद का निर्माण सन् 1766-67 मे करवाया था इसका निर्माण कच्ची ईट तथा सुर्खी चुना मसाले से हुआ इसकी नीव स्वयं रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत खाँ ने रखी थी सबसे पहले इमाम हाफ़िज़ नुरूद्दीन गजनवी थे
  
दरगाह हजरत शाहजी मियांकुतबे पीलीभीत हजरत हाजी शाहजी मोहम्मद शेर मियां रहमतुल्ला अलैह की दरगाह नगर के उत्तर दिशा मे स्थित है यहाँ मजार पर चादर चढ़ाने से दिल से मांगी गयी हर मुराद पूरी होती है
 
गौरी शंकर मन्दिर - गौरी शंकर मन्दिर लगभग 250 साल पुराना यह मन्दिर पीलीभीत मे स्थित है पूरब दक्षिण मे दो दरवाजे है जिसका निर्माण रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत खाँ ने कराया था यह मुख्य मन्दिर गौरी शंकर का है इस मन्दिर का शिवलिंग पुरातत्व विभाग द्वारा 2000 वर्ष पुराना माना गया है इस शिवलिंग का रंग लाल है शिवलिंग पर पार्वती तथा शिव जी के आधे- आधे रूप बने हुए है एक विशाल अद् भुत द्वार है जिसे रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत खाँ ने 1770 मे बनवाया था
 
जयसंतरी देवी का मन्दिर इसका इतिहास 300 वर्ष पुराना है किवदंती के अनुसार यहां पहले नकटा नाम का दानव रहता था जो इस रास्ते से गुजरता था तो दानव उसे खा जाता था उसी रास्ते से एक बार जयसंतरी देवी गुजरी जिससे देवी ने उस दानव का वध कर दिया उस राक्षस को खोजा गया तो वह मन्दिर से कुछ दूरी पर पाया गया उसकी नाक कटी हुई थी उस स्थान को नकटा दाना चौराहा कहा जाता है                
दूधिया मन्दिर मन्दिर काफी पुराना है इस मन्दिर मे दूध के समान श्वेत शिवलिंग बना हुआ है। सावन के महीने मे इस मंदिर पर मेला लगता है
 
गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा छेबी पातशाही प्राचीन समय मे यह गुरुद्वारा एक धर्मशाला के रूप मे था श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ नियमित रूप से होता था श्री हर गोविंद साहिब जी पंजाब से नानकमत्ता साहिब की यात्रा के दौरान इस धर्मशाला मे रुके थे

मथोडिस्ट चर्च नगर के मोहल्ला खाकरा मे 100 बर्ष से अधिक पुराना मथोडिस्ट चर्च इसथित है यहाँ प्रति बर्ष क्रिसमस डे अन्य ईसाई पर्व पर बड़े इस्तर पर प्रार्थना सभा का आयोजन होता है
 
पौराणिक ताल लिलहरबिल्सण्डा वामरौली मार्ग के निकट प्राचीन गाँव लिलहर है चैत्र की अमावस्या को यहाँ मेला लगता है राजा मोरधव्ज के एक भाई नीलध्वज को कोड रोग से पीड़ित था एक बार वह अपने काफिले से इसी स्थान पर आए यहाँ एक पोखर था पोखर के पानी से हाथ का कोड ठीक हो गया

कमल कुमार राठौर
पीलीभीत